रितेश देशमुख ने छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन पर आधारित एक नई फिल्म बनाई है, जिसका नाम है ‘राजा शिवाजी’। खास बात ये है कि इस फिल्म को उन्होंने सिर्फ डायरेक्ट ही नहीं किया, बल्कि खुद शिवाजी महाराज की भूमिका भी निभाई है। माना जा रहा है कि यह फिल्म उसी ऐतिहासिक सिनेमाई दुनिया का हिस्सा है, जिसमें पहले ‘तान्हाजी’ और ‘छावा’ जैसी फिल्में आ चुकी हैं।
ऐतिहासिक और बायोग्राफिकल फिल्में बनाना हमेशा चुनौतीपूर्ण काम होता है। खासतौर पर तब, जब कहानी किसी ऐसे महान व्यक्तित्व की हो, जिन्हें आज भी लोग गहरे सम्मान से याद करते हैं। ऐसे किरदारों पर ज़रा सी चूक भी भारी पड़ सकती है। शायद यही वजह है कि अक्सर ऐसी फिल्मों में बहुत सुरक्षित और तयशुदा रास्ता अपनाया जाता है। यानी वही पारंपरिक बायोपिक अंदाज़, जिसमें संघर्ष, उपलब्धियां और देशभक्ति का मिश्रण डालकर कहानी आगे बढ़ाई जाती है।
‘राजा शिवाजी’ भी काफी हद तक इसी फॉर्मूले पर चलती दिखाई देती है। फिल्म शिवाजी महाराज को एक इंसान की तरह कम, और एक महापुरुष की तरह ज़्यादा पेश करती है। उनके जीवन के अहम पड़ावों को एक-एक कर सामने रखा जाता है, लेकिन उनके व्यक्तित्व की गहराई में बहुत कम उतरा जाता है। कहानी में भगवा ध्वज, युद्ध के नारे, स्वराज्य का सपना और शौर्य का प्रदर्शन भरपूर है, लेकिन भावनात्मक स्तर पर फिल्म थोड़ी दूरी बनाए रखती है।
अगर कोई फिल्म किसी ऐतिहासिक शख्सियत पर बने और उस व्यक्ति के मानवीय पहलू को सामने न लाए, तो दर्शक जुड़ाव महसूस नहीं कर पाते। यही कमी यहाँ भी नजर आती है। फिल्म हमें बताती है कि शिवाजी महाराज कितने महान नेता थे, कितने कुशल शासक थे, लेकिन वो इंसान के तौर पर कैसे थे, इसे ज्यादा जगह नहीं मिलती।
कहानी की शुरुआत बचपन से होती है, जहां शिवाजी महाराज को जन्मजात महानता के साथ दिखाया गया है। उनके हर फैसले, हर संघर्ष और हर विजय को गौरवपूर्ण अंदाज़ में पेश किया गया है। सबसे बड़ा केंद्र बिंदु है उनका सपना हिंद स्वराज्य। फिल्म इसी विचार को लगातार आगे बढ़ाती है। हालांकि एक अच्छी बात ये है कि फिल्म आज के राजनीतिक माहौल को भुनाने की कोशिश नहीं करती। देशभक्ति को जरूरत से ज्यादा उछालने या अनावश्यक उत्तेजना पैदा करने की बजाय कहानी अपेक्षाकृत संयमित रहती है। यह फिल्म का सकारात्मक पक्ष कहा जा सकता है।
अभिनय की बात करें तो रितेश देशमुख ने पूरी मेहनत की है, लेकिन कई जगह अभिनेता और किरदार के बीच दूरी महसूस होती है। शिवाजी महाराज का जो व्यक्तित्व और आभा इतिहास में बताई जाती है, वह हर दृश्य में पूरी तरह उभर नहीं पाती। फिर भी कुछ भावनात्मक दृश्यों में रितेश असर छोड़ते हैं, खासकर मां के सामने दुखद समाचार सुनाने वाला दृश्य बेहद संवेदनशील बन पड़ा है।
संजय दत्त ने अफज़ल खान का किरदार निभाया है। उनका चरित्र पूरी तरह नकारात्मक रूप में गढ़ा गया है। उसमें कोई जटिलता या परतें नजर नहीं आतीं। दूसरी ओर शिवाजी महाराज को लगभग निष्कलंक दिखाया गया है। जब अच्छाई और बुराई को इतने सीधे तरीके से रखा जाता है, तो कहानी भी काफी सीधी हो जाती है।
अभिषेक बच्चन ने संभाजी के किरदार में प्रभाव छोड़ा है। उनका स्क्रीन प्रेजेंस आकर्षक लगता है और उनके हिस्से थोड़े और दृश्य होते, तो शायद फिल्म को फायदा मिलता। वहीं अमोल गुप्ते जैसे कलाकार का सीमित उपयोग खटकता है। विद्या बालन भी सरप्राइज़ एंट्री में नजर आती हैं, लेकिन उनका रोल छोटा है। फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसका भावनात्मक जुड़ाव है। कहानी आपको प्रभावित तो करती है, लेकिन भीतर तक छू नहीं पाती। दर्शक कई जगह घटनाओं को देखते हैं, महसूस कम करते हैं।
एक्शन सीक्वेंस अच्छे बनाए गए हैं। खासकर दूसरे हिस्से में अफज़ल खान और शिवाजी महाराज के बीच तनावपूर्ण टकराव वाला दृश्य रोमांच पैदा करता है। यही हिस्सा फिल्म को थोड़ी ऊर्जा देता है और शिवाजी महाराज की रणनीति व युद्ध कौशल को प्रभावशाली ढंग से दिखाता है।
तकनीकी रूप से अगर CGI पर और मेहनत की जाती, तो सिनेमाघर का अनुभव और बेहतर हो सकता था। इसके अलावा फिल्म की लंबाई भी चुनौती है। लगभग सवा तीन घंटे लंबी यह कहानी कई हिस्सों में बंटी है, लेकिन कसावट की कमी महसूस होती है। थोड़ी एडिटिंग फिल्म को ज्यादा असरदार बना सकती थी।
कुल मिलाकर ‘राजा शिवाजी’ खराब फिल्म नहीं है, लेकिन यादगार फिल्म भी नहीं बन पाती। इसमें भव्यता है, सम्मान है, इरादा है, मगर वो आत्मा नहीं, जो किसी ऐतिहासिक किरदार को पर्दे पर अमर बना दे। यह शिवाजी महाराज की उपलब्धियों का चित्रण करती है, मगर उनके व्यक्तित्व की धड़कन तक पूरी तरह नहीं पहुंचती।


