ईरान की राजनीति में यदि किसी एक नाम ने पिछले कई दशकों तक निर्णायक प्रभाव बनाए रखा, तो वह था अयातुल्ला अली खामेनेई का। एक सख्त इस्लामिक नेतृत्व की छवि के साथ पहचाने जाने वाले खामेनेई का व्यक्तित्व केवल धार्मिक या रणनीतिक दायरे तक सीमित नहीं था; उनके विचारों में इतिहास, सभ्यता और औपनिवेशिक अनुभवों की गहरी समझ भी झलकती थी। भारत के संदर्भ में उनका जुड़ाव इसी वैचारिक धरातल पर खड़ा दिखाई देता है।
खामेनेई कई बार सार्वजनिक मंचों से भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की किताब Glimpses of World History का जिक्र करते थे। उनका कहना था कि इस किताब को पढ़ने के बाद ही उन्हें समझ आया कि औपनिवेशिक शासन से पहले भारत कितनी उन्नत सभ्यता और मजबूत औद्योगिक ढांचे वाला देश था। वे मानते थे कि भारत में उस दौर में एडवांस्ड इंडस्ट्री, विज्ञान और उत्पादन क्षमता मौजूद थी, जिसे ब्रिटिश शासन ने व्यवस्थित तरीके से कमजोर किया ताकि भारत उनकी आयातित वस्तुओं पर निर्भर हो जाए।
खामेनेई ने अपने भाषणों में यह भी कहा कि नेहरू ने साफ लिखा है कि कैसे इंग्लैंड जैसे छोटे देश ने भारत जैसे विशाल देश के संसाधनों का दोहन कर खुद को मजबूत किया। उनके अनुसार, यह सिर्फ भारत की कहानी नहीं थी, बल्कि यही रणनीति दूसरे देशों—यहां तक कि ईरान—में भी अपनाई गई। इसलिए वे नेहरू को एक “भरोसेमंद और जानकार” लेखक मानते थे, जिनकी ऐतिहासिक व्याख्या उपनिवेशवाद की वास्तविकता को उजागर करती है।
भारत से उनका जुड़ाव सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहा। 1981 में, रूहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में बनी नई इस्लामिक व्यवस्था के शुरुआती वर्षों में, खामेनेई भारत आए। उस समय वे ईरान की रिवोल्यूशनरी काउंसिल के प्रभावशाली सदस्य थे। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मुलाकात की और बेंगलुरु व कर्नाटक के अलीपुर जैसे इलाकों का दौरा किया। अलीपुर, जहां शिया समुदाय की बड़ी आबादी है, वहां उनके स्वागत की तस्वीरें आज भी ईरानी अभिलेखों में दर्ज हैं।
कश्मीर यात्रा का जिक्र भी उनकी भारत यात्रा का अहम हिस्सा है। उस दौर में शिया और सुन्नी समुदायों के बीच तनाव था। श्रीनगर में एक मस्जिद में दिए गए उनके 15 मिनट के संबोधन को स्थानीय लोगों ने ऐतिहासिक बताया। कहा जाता है कि उनके भाषण के बाद दोनों समुदायों के बीच आपसी दूरी कम हुई और धार्मिक स्थलों पर साझा उपस्थिति बढ़ी। यह उनके लिए सिर्फ धार्मिक संदेश नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का प्रतीक था।
दशकों बाद, जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तेहरान पहुंचे, तो खामेनेई ने अपनी भारत यात्रा को याद करते हुए महात्मा गांधी, नेहरू और मौलाना अबुल कलाम आजाद की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि भारत की असली ताकत उसकी धार्मिक विविधता और सह-अस्तित्व की भावना में है। उनके मुताबिक, सांप्रदायिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता देना ही किसी भी देश की स्थिरता की कुंजी है।
1989 में सुप्रीम लीडर बनने के बाद उन्होंने भारत का औपचारिक दौरा नहीं किया, लेकिन भारत के प्रति उनकी रुचि और ऐतिहासिक दृष्टिकोण लगातार उनके भाषणों में झलकता रहा। आज जब उनकी मृत्यु की खबरों के बीच दुनिया उनकी विरासत पर चर्चा कर रही है, तो यह भी याद किया जा रहा है कि एक कट्टर इस्लामिक नेता माने जाने वाले खामेनेई, भारत के इतिहास और नेहरू के लेखन से गहराई से प्रभावित थे। यह पहलू उनकी राजनीतिक छवि का एक अलग और कम चर्चित आयाम सामने लाता है।


