बॉलीवुड एक्टर Varun Dhawan हाल ही में अपनी पर्सनल लाइफ को लेकर चर्चा में आए, जब उन्होंने अपनी बेटी लारा के बारे में एक अहम खुलासा किया। लारा अब लगभग 2 साल की होने वाली है, लेकिन जब वह करीब डेढ़ साल की थी, तब उसे एक मेडिकल कंडीशन डायग्नोज़ हुई थी, जिसे DDH कहा जाता है।
DDH यानी Developmental Dysplasia of the Hip एक ऐसी स्थिति है, जिसमें बच्चे के कूल्हे का जोड़ ठीक से विकसित नहीं हो पाता। इस समस्या में हिप जॉइंट अपनी जगह से खिसक सकता है या ढीला रह सकता है। इसका असर बच्चे के चलने-फिरने पर पड़ता है कई बार एक पैर दूसरे से छोटा या लंबा दिखने लगता है, और बच्चे को चलने या दौड़ने में परेशानी हो सकती है। आगे चलकर ये समस्या अर्थराइटिस या स्लिप डिस्क जैसी दिक्कतों का कारण भी बन सकती है।
पश्चिमी देशों में इस कंडीशन की पहचान अक्सर जन्म के समय ही हो जाती है, लेकिन भारत में कई बार ये समय पर पकड़ में नहीं आती। हालांकि यहां भी इलाज की अच्छी सुविधाएं उपलब्ध हैं। वरुण ने बताया कि लारा के मामले में समय पर पहचान और सही देखभाल से काफी मदद मिली, जिससे सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ी।
हालांकि इलाज आसान नहीं था। लारा को करीब ढाई महीने तक स्पाइका कास्ट में रहना पड़ा, जो छोटे बच्चों के लिए काफी असहज होता है। इसी प्रक्रिया के जरिए उसके कूल्हे को सही पोज़ीशन में लाया गया। अब उसका कास्ट हट चुका है और वह ब्रेस की मदद से धीरे-धीरे ठीक हो रही है।
DDH ऐसी कंडीशन है, जो कुछ बच्चों में जन्म के साथ ही होती है, जबकि कुछ में बाद में विकसित हो सकती है। यह एक या दोनों कूल्हों को प्रभावित कर सकती है। खास बात ये है कि इसमें आमतौर पर दर्द नहीं होता, इसलिए बच्चे रोते नहीं हैं और पैरेंट्स को देर से पता चलता है।
इसके कुछ संकेतों पर ध्यान देना जरूरी है जैसे बच्चे के पैरों की लंबाई में फर्क दिखना, पैर फैलाने में दिक्कत होना, जांघ या कूल्हों पर असमान स्किन फोल्ड्स, या फिर बच्चे का देर से चलना या लंगड़ाकर चलना। ऐसे लक्षण नजर आएं तो तुरंत जांच करवाना जरूरी है, जिसमें अल्ट्रासाउंड या एक्स-रे से स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
कुछ बच्चों में इस समस्या का खतरा ज्यादा होता है जैसे ब्रीच पोजिशन में जन्म लेने वाले बच्चे, परिवार में पहले से इसका इतिहास होना, पहला बच्चा होना या लड़कियां होना।
इलाज की बात करें तो यह मुख्य रूप से तीन तरीकों से किया जाता है। सबसे पहले ब्रेस का इस्तेमाल किया जाता है, जो हिप को सही स्थिति में रखने में मदद करता है और छोटे बच्चों में यह काफी प्रभावी होता है। अगर इससे पूरी तरह सुधार नहीं होता, तो प्लास्टर का सहारा लिया जाता है, जिसमें कमर से पैरों तक कास्ट लगाया जाता है ताकि जोड़ स्थिर रहे। और अगर स्थिति ज्यादा गंभीर हो या देर से पता चले, तो सर्जरी का विकल्प अपनाया जाता है।
इलाज का तरीका पूरी तरह बच्चे की उम्र और समस्या की गंभीरता पर निर्भर करता है। इसलिए सबसे जरूरी बात यह है कि जन्म के बाद बच्चे का नियमित चेकअप कराया जाए, ताकि ऐसी किसी भी समस्या को समय रहते पहचाना और ठीक किया जा सके।


