भारत के न्यायिक इतिहास में ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं, जब सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फैसले को वापस ले लिया हो। लेकिन हाल के महीनों में सर्वोच्च अदालत ने कई मामलों में अपने आदेशों को पलटकर यह संकेत दिया है कि न्यायिक प्रणाली के भीतर निरंतर पुनर्मूल्यांकन और आत्म-संशोधन की प्रक्रिया जारी है।
तमिलनाडु बनाम गवर्नर मामला: अदालत का U-turn
20 नवंबर को दिए गए एक महत्वपूर्ण निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार और गवर्नर आर.एन. रवि के बीच चल रही तनातनी पर अपनी पहले की ही टिप्पणी को गलत ठहराते हुए बदल दिया। मामला बिलों की मंजूरी से जुड़ा था, जिन्हें गवर्नर महीनों तक लंबित रखते रहे—एक बिल तो जनवरी 2020 से अटका हुआ था।
8 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने गवर्नर को सख्त फटकार लगाई थी और स्पष्ट दिशानिर्देश दिए थे कि:
एक महीने के भीतर निर्णय दें, तीन महीने में बिल लौटाएं, और यदि राष्ट्रपति के पास भेजना हो तो निर्धारित समय का पालन करें। लेकिन इस आदेश से बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। इसके बाद राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 143 के तहत कोर्ट से स्पष्टीकरण मांगा।
20 नवंबर को संविधान पीठ ने कहा कि अदालत किसी बिल को ‘स्वतः पारित’ मानने का आदेश नहीं दे सकती, क्योंकि यह कार्यपालिका के संवैधानिक अधिकारों में दखल होगा। अर्थात्, गवर्नर के लिए समयसीमा तय करने वाले पुराने आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने अब अस्वीकार कर दिया।
हालाँकि कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि यदि गवर्नर जानबूझकर देरी करें और शासन प्रभावित हो, तो अदालत केवल निर्णय की समयबद्धता पर बल दे सकती है—बिल की गुणवत्ता या उसके निहितार्थ पर टिप्पणी किए बिना।
पर्यावरण मंजूरी मामला: दो दिन में बदला रुख
16 मई को सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने केंद्र सरकार को झटका देते हुए कहा था कि किसी भी प्रोजेक्ट को “एक्स-पोस्ट फैक्टो”—यानी काम शुरू होने के बाद—पर्यावरण मंजूरी नहीं दी जा सकती। इस आदेश के चलते 2017 की अधिसूचना और 2021 का दिशानिर्देश भी रद्द हो गए थे।
लेकिन 18 नवंबर को CJI बी.आर. गवई की बेंच ने 2:1 के बहुमत से इस फैसले को पलट दिया। बेंच ने कहा कि पिछले फैसलों (Alembic Pharmaceuticals, D Swamy, Pahwa Plastics) में स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने विशेष परिस्थितियों में बाद में दी जाने वाली मंजूरी को वैध माना है।
CJI ने चेताया कि पुराने फैसले को कायम रखा गया तो सरकारी और निजी—दोनों—श्रेणियों के हजारों करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट गिराने पड़ सकते हैं। इसलिए, वनशक्ति केस का फैसला पर इनक्यूरियम घोषित करके बदल दिया गया।
स्ट्रे डॉग्स का मामला: 11 दिनों में उलट गया आदेश
11 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस पारदीवाला–महादेवन बेंच ने आदेश दिया था कि दिल्ली–NCR की सड़कों से सभी आवारा कुत्तों को उठाकर शेल्टर में भेजा जाए ताकि बच्चों पर हमलों और रेबीज़ के ख़तरे को रोका जा सके।
लेकिन केवल 11 दिन बाद जस्टिस विक्रम नाथ की बेंच ने इस आदेश को बदलते हुए स्पष्ट किया—
कुत्तों का वैक्सीनेशन और नसबंदी हो, इसके बाद उन्हें उसी स्थान पर छोड़ा जाए जहां से उठाया गया था। केवल आक्रामक या रेबीज़-खतरे वाले कुत्तों को ही अलग रखा जाए। अदालत ने यह भी कहा कि सड़कों पर कुत्तों को खाना खिलाना गलत है, इसलिए हर वार्ड में “फीडिंग ज़ोन” तय किए जाएं जहां नियंत्रित तरीके से भोजन कराया जा सके।
लगातार बदलते फैसले: सवालों के घेरे में न्यायपालिका
इन सभी मामलों ने यह बहस तेज कर दी है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट अपने आदेशों पर बार-बार पुनर्विचार क्यों कर रहा है।
क्या ये जनदबाव का असर है? या अदालत को लग रहा है कि कुछ मामलों में निर्णय उचित कानूनी आधार के बिना दिए गए?
या फिर यह संकेत है कि न्यायिक प्रक्रिया अत्यधिक जटिल और बहुस्तरीय हो चुकी है?
कारण चाहे जो भी हो—यह बात स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णयों ने देश की सर्वोच्च अदालत के भीतर निर्णय-प्रक्रिया, स्थिरता और न्यायिक संतुलन पर कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।


