राजस्थान के सांभर में स्थित देवयानी तीर्थ, जिसे छोटा पुष्कर भी कहा जाता है, अपने ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के कारण एक विशेष स्थान रखता है। यह तीर्थ स्थल अपनी प्राचीनता और पौराणिक महत्ता के चलते “तीर्थों की नानी” कहलाता है। यहाँ असुरों के गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी का मंदिर स्थित है, जिनकी हिंदू धर्म में पूजा-अर्चना की जाती है। महाभारत में भी देवयानी का उल्लेख मिलता है, जहाँ उनका विवाह कौरवों के पूर्वज राजा ययाति से हुआ था। देवयानी के देवी बनने की कथा अत्यंत रोचक है और यही कथा इस तीर्थ के महत्व को और भी विशेष बनाती है।
प्रेम प्रसंग जिसने देवयानी को देवी बनाया
स्थानीय मान्यताओं और मंदिर के पुजारी के अनुसार, असुरों के गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी और देवताओं के गुरु बृहस्पति के पुत्र कच के बीच गहरा प्रेम था। किंवदंती कहती है कि इसी प्रेम प्रसंग के कारण दोनों को एक-दूसरे से श्राप मिला, जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। कहा जाता है कि कच द्वारा दिए गए श्राप के परिणामस्वरूप देवयानी का जीवन आगे चलकर कौरव वंश से जुड़ गया। यही कारण है कि आज भी देवयानी को देवी स्वरूप में पूजित किया जाता है और यह तीर्थ स्थल विशेष धार्मिक महत्व रखता है।
देवयानी और कच की प्रेम कथा
सांभर देवयानी मंदिर के मुख्य पुजारी हरिप्रसाद शर्मा बताते हैं कि देवताओं के गुरु बृहस्पति और असुरों के गुरु शुक्राचार्य के बीच सदैव ज्ञान और शक्ति की प्रतिस्पर्धा रहती थी। शुक्राचार्य के पास संजीवनी विद्या थी — ऐसी विद्या जिसके माध्यम से वे युद्ध में मारे गए असुरों को पुनर्जीवित कर देते थे। इस कारण देवता असुरों को पराजित नहीं कर पाते थे। देवताओं ने इस विद्या को प्राप्त करने की योजना बनाई और बृहस्पति के पुत्र कच को शुक्राचार्य के पास शिष्य बनाकर भेजा। शुक्राचार्य ने कच को शिष्य रूप में स्वीकार किया और उसे शिक्षा देने लगे। इसी दौरान, उनकी पुत्री देवयानी को कच से प्रेम हो गया।
जब असुरों को पता चला कि बृहस्पति का पुत्र कच उनके गुरु के आश्रम में संजीवनी विद्या सीखने आया है, तो वे क्रोधित हो उठे और कच की हत्या कर दी। देवयानी को जब यह ज्ञात हुआ, तो उसने अपने पिता से कच को पुनर्जीवित करने की विनती की। पुत्री की प्रार्थना स्वीकार करते हुए शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या का प्रयोग किया और कच को जीवित कर दिया। यह घटनाक्रम बार-बार दोहराया गया — असुर बार-बार कच को मारते रहे और हर बार देवयानी के आग्रह पर शुक्राचार्य उसे पुनर्जीवित करते रहे।
कच की पुनर्जीवित होने से हुई शुक्राचार्य की मृत्यु
असुरों ने चाल चली। उन्होंने कच को मारकर उसका शरीर जला दिया, फिर उसकी अस्थियों का चूर्ण बनाकर उसे मदिरा में मिला दिया और वह मदिरा स्वयं शुक्राचार्य को पिला दी। जब शुक्राचार्य ने कच को पुकारा, तो उसकी आवाज़ उनके पेट से आई। यह देखकर देवयानी व्याकुल हो उठी और रोने लगी। पुत्री के दुख से व्यथित होकर शुक्राचार्य ने फिर से संजीवनी विद्या का प्रयोग किया। परिणामस्वरूप कच उनके पेट को फाड़कर बाहर आ गया, लेकिन इसी प्रक्रिया में शुक्राचार्य की मृत्यु हो गई। कच ने अपने गुरु से सीखी हुई विद्या का उपयोग करते हुए शुक्राचार्य को पुनः जीवित कर दिया।
श्राप जिसने दोनों को अलग कर दिया
जब कच देवलोक लौटने लगे, तो देवयानी ने उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा। लेकिन कच ने यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। इससे आहत होकर देवयानी ने कच को श्राप दिया कि वह अपने पिता से सीखी हुई संजीवनी विद्या का उपयोग किसी को जीवित करने के लिए नहीं कर पाएगा। इस अन्यायपूर्ण श्राप से दुखी होकर कच ने भी देवयानी को श्राप दे दिया कि उसका विवाह किसी ब्राह्मण से नहीं होगा। बाद में, देवयानी का विवाह कौरवों के पूर्वज राजा ययाति से हुआ।
यही कथा आगे चलकर देवयानी के देवी रूप में पूजन का आधार बनी — और इसी कारण सांभर का देवयानी तीर्थ, आज “छोटा पुष्कर” के नाम से प्रसिद्ध है, जहाँ प्रेम, त्याग और श्राप की यह अमर कथा आज भी श्रद्धा के साथ सुनाई जाती है।
इस लेख में वर्णित घटनाएँ, पात्र और कथाएँ मुख्यतः पौराणिक मान्यताओं, स्थानीय परंपराओं और धार्मिक विश्वासों पर आधारित हैं। इनका उद्देश्य केवल जानकारी और सांस्कृतिक संदर्भ प्रस्तुत करना है। यहाँ दी गई किसी भी कथा या प्रसंग को ऐतिहासिक तथ्य के रूप में न लिया जाए। लेख का उद्देश्य किसी धर्म, आस्था या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है।


