चुनाव आयोग द्वारा कई राज्यों में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की घोषणा होते ही लाखों सरकारी कर्मचारियों—खासतौर पर बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLOs)—की ज़िंदगी में मानो भूचाल आ गया है। ये वही लोग हैं जो इस समय अपने करियर का शायद सबसे भारी काम कर रहे हैं। दिनभर सैकड़ों लोगों से मिलना, घर-परिवार को समय न दे पाना, रिश्तेदारी में शामिल न हो पाना, लगातार घंटों-घंटों फोन बजता रहना, बीमारी में भी काम जारी रखना—सबकुछ उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। वोटर्स उनकी बात ठीक से नहीं सुनते और अधिकारी उनकी शिकायतों पर ध्यान नहीं देते। पुरुष फॉर्म लेकर नौकरी पर निकल जाते हैं, महिलाएँ पिता के नाम की जगह ससुर का नाम भर देती हैं, बच्चे फॉर्म्स से खिलवाड़ कर देते हैं। कभी इंटरनेट काम नहीं करता, तो कभी मोबाइल एप्लिकेशन ठप हो जाती है।
इन सबके बीच कई जगहों से निराशा भरी खबरें भी आती हैं—कुछ BLOs के इस्तीफे, कुछ के एक्सीडेंट, कुछ को हार्ट अटैक, और कई मामलों में मौत तक की सूचना। परिवारों की पीड़ा तब और बढ़ जाती है जब सोशल मीडिया पर लोग तंज कसते हुए लिखते हैं—“जरा मेहनत क्या कर ली, रोना शुरू कर दिया।”
SIR के दूसरे चरण को शुरू हुए अभी सिर्फ 22 दिन हुए हैं और इसी बीच कम से कम 6 राज्यों से 15 BLOs की मौत की खबरें सामने आ चुकी हैं। किसी ने खुद अपनी जान ले ली, कोई अचानक बीमार पड़ा, और कुछ सड़क दुर्घटना में चले गए। कारण चाहे जो भी रहा हो, हर मामले के पीछे एक बात साफ दिखाई देती है—कई जगहों पर वर्कलोड इंसानी क्षमता से कहीं ज्यादा है।
इस प्रक्रिया में 5 लाख 32 हज़ार से अधिक BLOs को लगाया गया है। इन्हें एक महीने के भीतर अपने-अपने क्षेत्रों के हर वोटर तक पहुँचकर फॉर्म बाँटने, समझाने, वापस जमा करने और फिर सारी जानकारी ऑनलाइन अपलोड करने की ज़िम्मेदारी दी गई है। SIR फेज़-2 के तहत लगभग 51 करोड़ वोटर्स को कवर किया जा रहा है। यानी महज़ 31 दिनों में 5 लाख से अधिक BLOs को 51 करोड़ लोगों तक पहुंचना है। पहली नज़र में ही यह लक्ष्य ‘अति कठिन’ लगता है, असंभव नहीं—पर बेहद चुनौतीपूर्ण।
जमीनी हकीकत को समझने के लिए कई क्षेत्रों के BLOs से बात की गई। उन्होंने बताया कि समस्याएँ कई स्तरों पर हैं—लोगों की अनजानगी, प्रशासनिक दबाव, तकनीकी खराबी और लगातार बढ़ता मानसिक तनाव। सबसे पहले समस्या फॉर्म की उपलब्धता की रही। SIR फेज़-2 की शुरुआत 4 नवंबर को हुई, लेकिन कई जगह BLOs को फॉर्म 10 या 12 नवंबर तक मिले। यानी शुरूआती समय ही कम हो गया, और दबाव दोगुना बढ़ गया। हर वोटर तक पहुँचना सबसे बड़ी चुनौती है। लोग सुबह जल्दी अपने काम पर निकल जाते हैं और रात में लौटते हैं। ऐसे में BLOs को सुबह-सुबह या देर रात में दस्तक देनी पड़ती है। दोपहर में जाएँ तो अक्सर घर में सिर्फ बच्चे मिलते हैं। एक ही घर में 2–3 बार चक्कर लगाना पड़ता है—फॉर्म देने और कलेक्ट करने दोनों समय।
बहुत से वोटर बाहर रहते हैं। पढ़ाई या नौकरी के कारण दूसरे राज्यों में गए लोगों से संपर्क करना मुश्किल हो जाता है। रिश्तेदार और पड़ोसी नंबर तक नहीं देते। कई BLOs को खुद पता लगाना पड़ता है कि कौन घर पर है और कौन बाहर। कई गांवों में वोटर्स की संख्या इतनी ज़्यादा होती है कि एक व्यक्ति के लिए सब तक पहुँचना लगभग दुश्वार हो जाता है। सहायक कर्मचारियों को ट्रेनिंग नहीं मिली है, इसलिए असली बोझ BLOs के कंधों पर ही है। तनाव बढ़ने की वजह से कई कर्मचारी चक्कर आकर गिर जाते हैं या बीपी बढ़ने जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
एक और बड़ी दिक्कत—लोग फॉर्म लेना ही नहीं चाहते। कुछ वोटर्स को डर है कि फॉर्म लेने से नाम कट जाएगा। कई फॉर्म घर में रखकर भूल जाते हैं। कई लोग अपने पुराने 2003 के रिकॉर्ड नहीं ढूँढ पाते, इसलिए फॉर्म भरने से कतराते हैं। नाम हटाने वाले फॉर्म 7 को लेकर भी वही कन्फ्यूज़न रहता है। BLOs को बार-बार समझाना पड़ता है और इस प्रक्रिया में समय और ऊर्जा दोनों खर्च होती हैं।
फॉर्म भरने का काम भी बेहद समय लेने वाला है। एक घर में 15 से 20 मिनट लग जाते हैं। ऊपर से जानकारी ऑनलाइन अपलोड करने का प्रेशर—एक BLO को रोज़ 100 फॉर्म फीड करने का आदेश दिया जाता है, जो ज़मीनी परिस्थितियों में लगभग असंभव लगता है। सबसे ज्यादा दिक्कत ‘2003 की जानकारी’ और ‘संबंधी का नाम’ वाले कॉलम में आती है। लोग बार-बार गलती करते हैं और BLO को उन्हें फिर से समझाना पड़ता है।
कुछ BLO स्थानीय नहीं होते, ट्रांसफर होकर आए होते हैं। उन्हें मोहल्ले या गांव के लोगों की जानकारी नहीं होती, जिससे काम और धीमा हो जाता है। जवाबदेही सिर्फ BLO की होती है। सहायक कर्मचारी अपने दूसरे कामों में व्यस्त रहते हैं। निलंबन का डर सिर्फ BLO को दिखाया जाता है। जिन इलाकों में वोटर्स ज्यादा हैं, वहाँ अतिरिक्त मदद नहीं दी जाती, पर सवाल हर रोज पूछा जाता है कि काम पूरा क्यों नहीं हुआ।
शादीशुदा महिलाओं का रिकॉर्ड जुटाना भी मुश्किल काम है। कई महिलाएँ मायके की जानकारी याद नहीं रखतीं। BLO को मायके तक जाकर जानकारी जुटानी पड़ती है, जिससे समय और मेहनत दोनों बढ़ते हैं। सबसे बड़ी दिक्कत—ऑनलाइन फीडिंग। इंटरनेट धीमा, सर्वर डाउन और तकनीकी खराबी बहुत आम हैं। कई BLO तकनीक में निपुण नहीं होते। कई घरों में पूरा परिवार बैठकर रात-रात भर फॉर्म फीड करने में मदद करता है।
महिला BLOs की स्थिति सबसे कठिन है। घर का काम, बच्चों की देखभाल, ससुराल की ज़िम्मेदारियाँ, पीरियड क्रैंप्स—और ऊपर से यह भारी workload। कई महिलाओं को दो अलग-अलग क्षेत्रों में BLO की ज़िम्मेदारी दी गई है। उनका कहना है—“अगर BLO का ही काम करते रहेंगे, तो अपना मूल काम कब करेंगे?”
BLOs की राय है कि इस पूरी प्रक्रिया को और समय दिया जाना चाहिए था। चरणबद्ध तरीक़े से काम होता तो तनाव भी कम होता और गुणवत्ता भी बेहतर आती। एक महीने में इतना बड़ा काम पूरा करना जल्दबाजी जैसा महसूस होता है। इसके बावजूद BLOs अपनी जिम्मेदारी निभाने में लगे हुए हैं। नई-नई तरकीबें निकालकर काम तेज़ कर रहे हैं—सोसायटी और गांवों के व्हाट्सऐप ग्रुप में जुड़कर जानकारी भेजना, खुद वीडियो बनाकर लोगों को समझाना, और गलतियों को कम करने के लिए पहले पेंसिल से फॉर्म भरवाना और बाद में पेन से फाइनल करना—सबकुछ सिर्फ इसलिए कि वोटर लिस्ट सही और समय पर अपडेट हो सके।


