बिहार चुनाव में खाता खोलने में नाकाम रही जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर अब हार के कारणों की समीक्षा में जुट गए हैं। उन्होंने स्वीकार किया है कि चुनाव मैदान में खुद न उतरने का फैसला अब उन्हें खेद दे रहा है। किशोर का कहना है कि उन्हें कम-से-कम 12 से 15 प्रतिशत वोट मिलने की उम्मीद थी, लेकिन वास्तविक आंकड़ा सिर्फ 4 प्रतिशत तक सिमट गया—यही उनके लिए आत्ममंथन का मुख्य आधार है।
चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर से जब पूछा गया कि क्या उन्हें खुद चुनाव न लड़ने का अफसोस है, तो उन्होंने स्पष्ट कहा, “इसे गलती माना जा सकता है… अगर मुझे हार की आशंका होती, तो अपने संसाधन, पैसा और विश्वसनीयता इस तरह दांव पर क्यों लगाता? इन्हीं संसाधनों से मैं आसानी से सांसद या विधायक बन सकता था। अगर मालूम होता कि जनसुराज को केवल 4% वोट मिलेंगे, तो ऐसा जोखिम कभी न लेता। मैंने कोई निजी सर्वे नहीं कराया, बल्कि पूरी तरह विश्वास के आधार पर यह दांव लगाया।”
इस चुनाव में जनसुराज को एक संभावित “एक्स फैक्टर” के रूप में देखा जा रहा था, क्योंकि राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में प्रशांत किशोर का रिकॉर्ड कई बड़ी जीतों से जुड़ा रहा है। पार्टी ने संगठन को मजबूत करने पर जोर देते हुए 243 में से 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन कोई भी सीट जीतने में सफल नहीं हो सकी।
चुनाव से पहले किशोर ने यह दावा किया था कि नीतीश कुमार की अगुवाई वाली जनता दल (यू) 25 से ज्यादा सीटें नहीं जीत पाएगी, लेकिन नतीजों में पार्टी को 85 सीटें मिलीं। जब इस पूर्वानुमान पर उनसे सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा,
“हर विधानसभा क्षेत्र में सरकार ने 100 से 125 करोड़ रुपये खर्च किए। लगभग 60–62 हजार लोगों को 10-10 हजार रुपये दिए गए। माना जा सकता है कि यह जानकारी पहले भी थी, लेकिन इसे आसान उदाहरण से समझिए—मान लीजिए किसी दौड़ में राहुल और प्रशांत उतरने वाले हैं। फिटनेस के आधार पर कहा गया कि राहुल जीतेंगे। लेकिन जैसे ही दौड़ शुरू हुई, प्रशांत मोटरसाइकिल लेकर आगे निकल जाएँ, तो नतीजा तो बदल ही जाएगा। ऐसे में अनुमान गलत लगना स्वाभाविक है।”
गौरतलब है कि बिहार में 6 और 11 नवंबर को दो चरणों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे 14 नवंबर को घोषित हुए। इनमें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने 202 सीटों पर जीत दर्ज करते हुए स्पष्ट बहुमत हासिल किया। इस गठबंधन में BJP को 89, JDU को 85, LJP(रामविलास) को 19, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा को पांच और राष्ट्रीय लोक मोर्चा को चार सीटें मिलीं।
विपक्षी महागठबंधन का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा और उसे कुल 35 सीटों से ही संतोष करना पड़ा। RJD केवल 25 सीटों तक सीमित रह गई, जो 2010 के बाद उसका सबसे खराब प्रदर्शन है। कांग्रेस छह सीटों तक सिमट गई। CPI(ML)(L) को दो, माकपा को एक सीट मिली, जबकि भाकपा को इस बार कोई सीट नहीं मिल सकी।


