वेनेजुएला पर अमेरिकी कार्रवाई को लेकर दुनिया दो हिस्सों में बँटी दिखाई देती है। एक तरफ इसे लोकतंत्र और मानवाधिकारों की रक्षा के नाम पर उठाया गया “ज़रूरी कदम” बताया जा रहा है, दूसरी ओर इसे अंतरराष्ट्रीय कानून की खुली अवहेलना कहा जा रहा है। इस शोरगुल के बीच ज़रूरत भावनात्मक प्रतिक्रिया की नहीं, बल्कि ठंडे दिमाग से यह समझने की है कि वास्तव में हुआ क्या है, कहा क्या जा रहा है, और किस हद तक वह कहा गया सच के साथ खड़ा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने इस कार्रवाई के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ़ शब्दों में कहा कि यह ऑपरेशन अमेरिका की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय अपराध के खिलाफ़ लड़ाई का हिस्सा था। उन्होंने यह भी दोहराया कि वेनेजुएला की तत्कालीन सत्ता—खासकर निकोलस मादुरो ड्रग तस्करी, मनी लॉन्ड्रिंग और आपराधिक नेटवर्क से जुड़े हुए थे और अब “उस अध्याय को समाप्त कर दिया गया है।” ट्रंप ने इस बात से इनकार किया कि यह हमला तेल पर कब्ज़े के लिए किया गया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि वेनेजुएला के तेल उद्योग को “स्थिर और उत्पादक” बनाने में अमेरिकी कंपनियाँ भूमिका निभाएँगी। यही वह विरोधाभास है जो सवाल पैदा करता है।
अंतरराष्ट्रीय कानून इस बिंदु पर बिल्कुल स्पष्ट है। United Nations चार्टर का अनुच्छेद 2(4) किसी भी संप्रभु देश की क्षेत्रीय अखंडता और राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ बल प्रयोग को प्रतिबंधित करता है। आत्मरक्षा का अधिकार अनुच्छेद 51 के तहत तभी लागू होता है, जब वास्तविक और तात्कालिक सशस्त्र हमला हुआ हो। वेनेजुएला के मामले में ऐसा कोई प्रमाण सामने नहीं आया कि उसने अमेरिका पर हमला किया हो। न ही सुरक्षा परिषद की अनुमति थी। इसका सीधा अर्थ यह है कि कानूनी आधार कमजोर है, चाहे राजनीतिक तर्क कितने भी जोरदार क्यों न हों।
अब सवाल यह कि क्या अमेरिका ने किसी समस्या को गढ़ा है? नहीं। वेनेजुएला पिछले कई वर्षों से गंभीर राजनीतिक और संस्थागत संकट में है। चुनावों की निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठे, विपक्ष को सीमित किया गया, न्यायपालिका की स्वतंत्रता घटी और मीडिया पर नियंत्रण बढ़ा। यह सब वेनेजुएला की सत्ता की जिम्मेदारी थी और इससे इनकार नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है; वह संस्थाओं, स्वतंत्रता और जवाबदेही से बनता है और इन मोर्चों पर वेनेजुएला पिछड़ा।
ड्रग्स के आरोपों को भी इसी संदर्भ में समझना होगा। पिछले पचास वर्षों में लैटिन अमेरिका में कोकीन का उत्पादन मुख्य रूप से कोलंबिया और उसके आसपास के क्षेत्रों में केंद्रित रहा है। वेनेजुएला ड्रग्स का बड़ा उत्पादक देश नहीं रहा, लेकिन वह नशीले पदार्थों की ढुलाई के एक प्रमुख रास्ते के रूप में उभरा। खासकर तब जब राज्य संस्थाएँ कमजोर पड़ीं और भ्रष्टाचार बढ़ा। यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही है कि वेनेजुएला ड्रग्स का प्रमुख उत्पादक नहीं रहा, लेकिन यह भी सच है कि उसका इस्तेमाल ट्रांज़िट रूट के रूप में बढ़ा। आरोप यह हैं कि सत्ता के कुछ हिस्सों ने इस प्रवाह को रोका नहीं। यह गंभीर आरोप हैं, पर इनका समाधान अदालतों और अंतरराष्ट्रीय जांच से होना चाहिए था, न कि हवाई हमलों से।
तेल का सवाल यहाँ अनदेखा नहीं किया जा सकता। वेनेजुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े सिद्ध तेल भंडार हैं। यह तथ्य दशकों से उसे वैश्विक राजनीति के केंद्र में रखता आया है। जब ट्रंप एक ओर कहते हैं कि यह हमला तेल के लिए नहीं है और दूसरी ओर अमेरिकी कंपनियों की भूमिका की बात करते हैं, तो संदेह पैदा होना स्वाभाविक है। शायद तेल ही एकमात्र कारण न हो, लेकिन यह भी मानना कठिन है कि उसका कोई महत्व नहीं। इतिहास गवाह है कि संसाधन, राजनीति और हस्तक्षेप अक्सर एक ही कहानी के अलग-अलग अध्याय होते हैं। तेल के खेल को भी समझिए आज दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार वेनेजुएला के पास है। लगभग 303 अरब बैरल। यह दुनिया भर के तेल का तकरीबन 20 फीसदी है। मात्रा के लिहाज़ से सऊदी अरब से भी ज्यादा है। हालांकि यह तेल मुख्यतः हेवी और एक्स्ट्रा-हेवी क्रूड श्रेणी का है, विशेषकर ओरिनोको बेल्ट क्षेत्र में। यह तेल गाढ़ा होता है, निकालने और रिफाइन करने में महँगा पड़ता है और इसके लिए बढ़िया टेक्नोलॉजी चाहिए। यहीं वेनेजुएला मार खाता है और अमेरिका की इंट्री होती है।
जबकि खाड़ी देशों—जैसे सऊदी अरव (≈267 अरब बैरल), ईरान (≈208 अरब बैरल), इराक (≈145 अरब बैरल), यूएई (≈113 अरब बैरल) और कुवैत (≈101 अरब बैरल)—के पास अपेक्षाकृत हल्का और उच्च गुणवत्ता वाला क्रूड ऑयल है, जिसे निकालना आसान और सस्ता है। इसी कारण खाड़ी देशों का तेल वैश्विक बाज़ार में ज़्यादा प्रतिस्पर्धी और लाभकारी माना जाता है, भले ही मात्रा में वेनेजुएला आगे हो। हालांकि तेल के अलावा वेनेजुएला सोना, लौह अयस्क, बॉक्साइट, हीरे, कोल्टन और प्राकृतिक गैस जैसे खनिज संसाधनों से भी समृद्ध है। प्राकृतिक गैस का भंडार लगभग 5.7 ट्रिलियन क्यूबिक मीटर आँका जाता है। यही विशाल लेकिन जटिल संसाधन संरचना वेनेजुएला को रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है—जहाँ संपदा बहुत है, लेकिन उसका दोहन राजनीतिक अस्थिरता, तकनीकी सीमाओं और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण आसान नहीं रहा है।
इस पूरी प्रक्रिया का सबसे परेशान करने वाला पहलू यह है कि सैन्य कार्रवाई को समाधान के रूप में पेश किया गया। जबकि वेनेजुएला पहले से ही आर्थिक गिरावट, अपराध और मानवीय संकट से जूझ रहा है। स्वास्थ्य और शिक्षा—जो कभी तेल आय के सहारे क्षेत्रीय उदाहरण माने जाते थे वहीं व्यवस्थाएँ प्रतिबंधों, मुद्रास्फीति और प्रशासनिक विफलता से चरमरा गईं। डॉक्टरों, शिक्षकों और युवाओं का पलायन हुआ। आम नागरिक पहले ही भारी कीमत चुका रहे थे। ऐसे में बम और मिसाइलें किसी सामाजिक मरहम की तरह काम नहीं कर सकतीं।
विपक्षी राजनीति की भूमिका भी सरल नहीं है। मारिया कोरिना मचाडो को लंबे समय से अधिनायकवादी प्रवृत्तियों के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वाली नेता के रूप में देखा गया है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उन्हें लोकतांत्रिक विकल्प के तौर पर प्रस्तुत किया गया। 2025 का शांति का नोबेल भी मिला, लेकिन अब, जब सत्ता परिवर्तन पर बाहरी हस्तक्षेप की छाया है, उनका भविष्य का रोल भी चुनौतीपूर्ण होगा। किसी भी नए नेतृत्व के लिए सबसे बड़ा प्रश्न यही रहेगा कि उसकी वैधता जनता से आती है या बाहरी समर्थन से। अगर आने वाले दिनों में मचाडो को सत्ता की कमान मिलती है और वो अमेरिका के लिए तेल का रास्ता खोलती हैं तो न सिर्फ अमेरिका सवालों में होगा बल्कि मचाडो के साथ साथ पूरी नोबेल कमिटी पर भी अमेरिका के पिछलग्गू होने का आरोप लगेगा।
इस पूरे घटनाक्रम से एक बात साफ़ होती है। वेनेजुएला की सरकार ने अपने नागरिकों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ न्याय नहीं किया, यह उसकी जिम्मेदारी थी और ऐसा न करना उसकी ऐतिहासिक भूल है। लेकिन अमेरिका ने जिस तरह से हस्तक्षेप किया, वह अंतरराष्ट्रीय कानून और वैश्विक व्यवस्था के लिए खतरनाक मिसाल छोड़ता है। अगर आरोप सही हैं, तो उन्हें साबित करने के रास्ते मौजूद थे, अगर बदलाव ज़रूरी था, तो उसके लिए कूटनीति और बहुपक्षीय दबाव के विकल्प थे। बल प्रयोग ने समस्या का समाधान नहीं किया; उसने उसे और जटिल बना दिया।
आज वेनेजुएला सिर्फ़ अपने भविष्य से नहीं जूझ रहा, बल्कि उस सवाल से भी जूझ रहा है कि क्या दुनिया में नियम वाकई सबके लिए समान हैं। जब शक्तिशाली देश कानून की व्याख्या अपनी सुविधा से करने लगते हैं, तो सबसे पहले कमजोर देशों की संप्रभुता टूटती है—और अंततः पूरी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर भरोसा। यही इस कहानी की सबसे असहज, लेकिन सबसे ज़रूरी सच्चाई है।
अनुरंजन झा,
चेयरमैन, गांधियन पीस सोसायटी, ब्रिटेन


