1870 के दशक का बंगाल अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों, समाज में बेचैनी और गुलामी के भारी दबाव से भरा हुआ था। इसी दौर में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने मातृभूमि को एक मां के रूप में देखने की परिकल्पना की। इस कल्पना से वंदे मातरम् की शुरुआत हुई—एक ऐसा गीत जिसने भारतीय समाज में मानसिक स्वतंत्रता की लौ जलायी।
वंदे मातरम् की रचना को 1870 के दशक के मध्य का माना जाता है। इसके शुरुआती शब्द कुछ ही दिनों में आकार ले चुके थे, लेकिन साहित्यिक रूप कई बार तराशा गया। 7 नवंबर 1875 को इसे पहली बार Bangadarshan पत्रिका में प्रकाशित किया गया। उस समय इतना प्रभावशाली और विद्रोहपूर्ण लेख छापना अपने आप में क्रांतिकारी कदम था।
1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया। उसी क्षण वंदे मातरम् एक गीत से आगे बढ़कर राष्ट्रवादी आंदोलन की पहचान बन गया। बाद के वर्षों में कई संगीतकारों ने इसकी अलग-अलग धुनें तैयार कीं, और ए. आर. रहमान की आधुनिक धुन ने इसे वैश्विक पहचान दिलाई।
स्वतंत्रता आंदोलन के हर बड़े चरण में वंदे मातरम् अग्रिम पंक्ति में रहा। 1905 के बंगाल विभाजन के विरोध में जब स्वदेशी आंदोलन चला, तब हजारों लोगों ने विदेशी कपड़ों की होली जलाते समय इसी गीत को सामूहिक रूप से गाया। 1916 के होम रूल मूवमेंट से लेकर 1920 के असहयोग आंदोलन तक यह हर सभा और जुलूस की धड़कन रहा। 1930 के दांडी मार्च और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी यह गीत ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ लोगों के हौंसले को मजबूत करता रहा।
1937 में कांग्रेस के फैज़ाबाद अधिवेशन में गीत के कुछ अंतरों पर धार्मिक आपत्तियाँ उठीं। रवीन्द्रनाथ टैगोर की सलाह पर कांग्रेस ने इसके केवल पहले दो अंतरों को आधिकारिक रूप से अपनाया। यह निर्णय उस समय सामाजिक संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से लिया गया, लेकिन आने वाले वर्षों में यह राजनीतिक विवाद का स्थायी मुद्दा बन गया।
आजादी के बाद बड़ा प्रश्न यह था कि भारत का राष्ट्रगान कौन होगा। एक तरफ वंदे मातरम् था, जो स्वतंत्रता संघर्ष की धड़कन बन चुका था। दूसरी तरफ जन गण मन था, जिसे अधिक समावेशी और विविधता का प्रतीक माना गया। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने निर्णय लिया कि जन गण मन राष्ट्रगान बनेगा और वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया जाएगा। यह फैसला किसी गीत को कमतर दिखाने के लिए नहीं था, बल्कि भारत की एकता और विविधता के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश थी।
हिंदी सिनेमा ने भी वंदे मातरम् को बड़ी संवेदनशीलता और शक्ति के साथ अपनाया। 1952 की फिल्म आनंद मठ में लता मंगेशकर का गाया संस्करण ऐतिहासिक बन गया। 1997 में ए. आर. रहमान की एल्बम Vande Mataram युवाओं की नई पहचान बन गई। बड़े पर्दे से लेकर स्टेज परफॉर्मेंस तक, यह गीत हमेशा देशभक्ति का प्रतीक रहा।
वंदे मातरम् का इतिहास जितना गौरवशाली है, उतना ही विवादों से भी भरा है। 1905 में ब्रिटिश हुकूमत ने इसे खतरनाक नारा कहा। 1923 में कांग्रेस अधिवेशन में पहली आपत्ति दर्ज हुई। 1937 में आधिकारिक कटौती हुई। 2006 में स्कूलों में इसे अनिवार्य करने पर देशभर में बहस छिड़ गई। 2014 के बाद यह फिर राजनीतिक बयानबाज़ी का महत्वपूर्ण विषय बन गया। 2023–24 में इसके 150 साल पूरे होने पर संसद से लेकर सड़क तक नए विवाद उभरे।
इसके बावजूद, वंदे मातरम् आज भी उतना ही जीवंत है जितना अपने जन्म के समय था। यह सिर्फ गीत नहीं—भाव, पहचान और मातृभूमि की पुकार है। इसलिए हर बार जब देश का सवाल उठता है, वंदे मातरम् अपने आप लोगों की जुबान पर आ जाता है।

