चिप्स, पिज़्ज़ा, बर्गर, कोल्ड ड्रिंक, पास्ता, नगेट्स — नाम सुनते ही ज़ुबान पर पानी आ जाता है। ये चीज़ें इतनी टेस्टी होती हैं कि थोड़ा-सा खाकर मन नहीं भरता। कोई सिर्फ़ एक चिप्स खाकर रुकता नहीं है, पूरा पैकेट कब खत्म हो जाता है पता ही नहीं चलता। खाना खाने के बाद भी दिल करता है कि कुछ चटर-पटर मिल जाए। कहीं से थोड़ा-सा पास्ता या पिज़्ज़ा मिल जाए तो मज़ा आ जाए। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है? जंक फूड खाने की इतनी तलब क्यों लगती है और इसकी आदत इतनी जल्दी क्यों बन जाती है?
दिलचस्प बात ये है कि पालक, मेथी, मटर, गोभी जैसी सेहतमंद चीज़ों के साथ ऐसा नहीं होता। ये सब यूँ ही नहीं हो रहा। इसके पीछे एक गहरा राज़ है, और वही राज़ हमें अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स तक ले जाता है। जिन चीज़ों को हम बार-बार खाना चाहते हैं, उन्हें अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स कहा जाता है। ये वो खाने की चीज़ें हैं जो रसोई में नहीं, फैक्ट्री में बनती हैं।
WHO के अनुसार, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स में नेचुरल फूड इंग्रीडिएंट्स बहुत कम होते हैं। इनमें रिफाइंड सामग्री, आर्टिफ़िशियल फ्लेवर, कलर, प्रिज़र्वेटिव और इमल्सीफायर ज़्यादा मात्रा में मिलाए जाते हैं। ये फूड्स पोषण नहीं देते, बस स्वाद देते हैं। लंबे समय तक खराब न होने और ज़बरदस्त टेस्ट की वजह से इन्हें खाने की आदत जल्दी लग जाती है।
चिप्स, नमकीन, इंस्टेंट नूडल्स, पास्ता, कोल्ड ड्रिंक, पैक्ड फ्रूट जूस, बिस्किट, केक, बेकरी प्रोडक्ट्स, फ्रोज़न पिज़्ज़ा, बर्गर, नगेट्स और फ्लेवर्ड योगर्ट — ये सभी अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स की श्रेणी में आते हैं। शोधों के अनुसार, ये चीज़ें पेट को पूरी तरह नहीं भरतीं और बार-बार खाने की इच्छा पैदा करती हैं। अगर किसी फूड पैकेट के लेबल पर 5–10 ऐसे इंग्रीडिएंट्स लिखे हों, जो आमतौर पर आपकी रसोई में नहीं होते, तो समझ जाइए वह अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड है।
असल में, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स भूख को नहीं, सीधे दिमाग को टारगेट करते हैं। इनमें मौजूद रिफाइंड शुगर, ज़्यादा नमक और अनहेल्दी फैट्स दिमाग में डोपामीन रिलीज़ करवाते हैं। डोपामीन वो केमिकल है जो हमें अच्छा महसूस कराता है। यही वजह है कि स्मोकिंग, शराब और ड्रग्स की लत भी इसी से जुड़ी होती है। लेकिन ये एहसास थोड़े समय के लिए होता है। जैसे ही डोपामीन का लेवल गिरता है, दिमाग सिग्नल देता है कि “मुझे और चाहिए।” ऊपर से इन फूड्स में प्रोटीन और फाइबर कम होते हैं, इसलिए पेट भरा-भरा महसूस नहीं करता।
कई रिसर्च इसे एडिक्शन जैसा पैटर्न मानती हैं। ये विल-पावर की कमी नहीं है। अगर किसी खाने को रोकना मुश्किल लग रहा है, तो समझिए ये भूख नहीं बल्कि डोपामीन से पैदा हुई क्रेविंग है। लगातार अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाने से एसिडिटी, गैस, ब्लोटिंग, इरिटेबल बाउल सिंड्रोम और पेट की सूजन बढ़ती है। वज़न बढ़ना, इंसुलिन रेजिस्टेंस और टाइप-2 डायबिटीज़ का खतरा भी रहता है। ये फैटी लिवर की वजह बन सकते हैं, कोलेस्ट्रॉल का बैलेंस बिगाड़ते हैं और दिल की बीमारियों का रिस्क बढ़ाते हैं। कई स्टडीज़ बताती हैं कि ये पेट के माइक्रोबायोम को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे पाचन से जुड़ी समस्याएं बढ़ती हैं।
ये नुकसान धीरे-धीरे होता है और बिना किसी चेतावनी के, इसलिए अक्सर हमें पता ही नहीं चलता। अच्छी बात ये है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स की लत छोड़ी जा सकती है। पहला नियम है कि इसे अचानक पूरी तरह बंद न करें। धीरे-धीरे मात्रा और फ्रीक्वेंसी कम करें। हर जंक फूड का हेल्दी विकल्प अपने पास रखें। चिप्स की जगह रोस्टेड चना या मखाना खाएं। कोल्ड ड्रिंक की जगह नींबू पानी या छाछ पिएं। बिस्किट की जगह फल और नट्स लें। हर मील में प्रोटीन और फाइबर बढ़ाइए और घर में जंक फूड रखने से बचिए। स्टडीज़ बताती हैं कि 7–10 दिनों में टेस्ट बड्स रिसेट हो जाते हैं और क्रेविंग अपने-आप कम होने लगती है।
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड ज़हर नहीं हैं, लेकिन अगर ये रोज़ की आदत बन जाएं तो ज़हर जैसा असर दिखाने लगते हैं। आपका पेट और लिवर नेचुरल फूड के लिए बने हैं, फैक्ट्री में बने खाने के लिए नहीं।


