डिजिटल मीडिया और गाहे बेगाहे स्मार्ट फोन स्क्रोल करते रहने के दौर में कुछ कुछ ऐसा दिख जाता है जो आपको ठहर कर सोचने पर मजबूर कर देता है। इन दिनों लंदन के एक वीडियो पर शायद आप सबकी नजर जरूर पड़ी होगी, आपने भी उस वीडियो पर अपने विचार बनाए होंगे लेकिन जिस तरीके से उसने वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाला है आप अभी तक नहीं डाल पाए होंगे, और यहीं हम चूक रहे हैं जाहिर है सभी वीडियो तो नहीं बना सकते लेकिन अपने विचार तो प्रकट कर ही सकते हैं या फिर अपने विचार से मिलते जुलते विचार को आगे तो ब़ढ़ा ही सकते हैँ।
लंदन की ट्यूब, टावर ब्रिज और भीड़भाड़ वाली सड़कों पर इन दिनों एक दृश्य बार-बार दिखाई देता है—एक व्यक्ति धोती, गमछा और बनावटी देहाती लहजे में “बिहारी समोसा” बेचता हुआ। पहली नज़र में यह किसी रंगीन स्ट्रीट-परफॉर्मेंस जैसा लग सकता है, लेकिन असल में यह एक पूरे समुदाय की पहचान को सस्ते तमाशे में बदल देने की प्रक्रिया है। यह सिर्फ़ समोसा बेचने का मामला नहीं है। यह इस बात का सवाल है कि “बिहारी” को ब्रिटेन जैसे समाज में किस रूप में पेश किया जा रहा है। जब कोई व्यक्ति जानबूझकर एक ऐसे किरदार को रचता है जिसमें बिहारी मतलब फेरीवाला, गरीब, देहाती और मज़ाकिया बन जाता है, तो वह भोजन नहीं, बल्कि एक पूर्वाग्रह बेच रहा होता है। दशकों से बिहार के लोग भारत में जिन सामाजिक रूढ़ियों से लड़ते आए हैं, वही रूढ़ियाँ अब ग्लोबल मंच पर नए पैकेज में परोसी जा रही हैं।
ब्रिटेन में रहने वाले बिहारी केवल रेस्तराँ या स्ट्रीट-फूड तक सीमित नहीं हैं। वे एनएचएस में डॉक्टर हैं, यूनिवर्सिटी में शोधकर्ता हैं, टेक और फाइनेंस में काम कर रहे हैं, अपने स्टार्ट-अप चला रहे हैं और टैक्स देने वाले सम्मानित नागरिक हैं। लेकिन सार्वजनिक दृश्य सबसे ज़्यादा ताक़तवर होते हैं। जब किसी समाज में किसी समुदाय की पहचान लगातार एक ही हास्यास्पद और निम्नवर्गीय छवि में दोहराई जाती है, तो वही छवि लोगों के दिमाग़ में सच बन जाती है। यही वजह है कि यह प्रस्तुति केवल “क्रिएटिव मार्केटिंग” नहीं कही जा सकती। यह सॉफ्ट रेसिज़्म है—वह नस्लीय भेदभाव जो हँसी, मज़ाक और लोकल कलर के नाम पर स्वीकार्य बना दिया जाता है। यह उस मानसिक ढाँचे को मज़बूत करता है जिसमें कुछ पहचानें आधुनिक और सम्मानित मानी जाती हैं, जबकि कुछ को देहाती तमाशा बना दिया जाता है।
“बिहारी” की यह छवि उन लोगों द्वारा गढ़ी जा रही है जो स्वयं उस बिहारी समुदाय से नहीं आते, लिहाजा मामला और भी गंभीर हो जाता है। ठीक से गौर करें तो यह सांस्कृतिक शोषण (cultural appropriation) का मामला है। किसी की पहचान को उधार लेकर उससे मुनाफ़ा कमाना, लेकिन उस पहचान के लोगों को उनके सम्मान से वंचित कर देना। पहले भारत के अलग अलग हिस्सों में बिहारी को गाली बना दिया गया जिससे लड़ने उबरने में पीढ़ियां खप गईं और देश के बाहर एक तबके द्वारा व्यापार के नाम पर उनका मजाक उड़ाना और एक खास छवि में बांधना निश्चित तौर पर निंदनीय और अफसोसनाक है।
ब्रिटेन का इमिग्रेशन और रोज़गार तंत्र पहले ही “हाई-स्किल” और “लो-स्किल” प्रवासियों के बीच फर्क करता है। जब किसी समुदाय को सार्वजनिक रूप से केवल सड़क के फेरीवाले के रूप में देखा जाएगा, तो यह फर्क और गहरा होगा। भले ही कोई वीज़ा अधिकारी यह न कहे कि उसने किसी वीडियो की वजह से फ़ैसला लिया, लेकिन सामाजिक पूर्वाग्रहों का वही माहौल उसकी सोच को आकार देता है। इसलिए यह बहस समोसे की नहीं है। यह उस गरिमा की है जिसके साथ एक समुदाय को देखा और पहचाना जाना चाहिए। “बिहारी” कोई पोशाक नहीं है जिसे पहनकर बेचा जाए। वह एक जीवित, विविध और आधुनिक पहचान है और उसे कार्टून में बदल देना केवल बिहार का नहीं, बल्कि पूरे प्रवासी समाज का अपमान है।
अनुरजंन झा
संस्थापक, भारतिका और रेजिडेंट एडिटर, यूरोप, न्यूज इंडिया


