अगर कोई बच्चा घंटों मोबाइल फोन में व्यस्त रहे, तो क्या उसे हार्ट अटैक आ सकता है? उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले से सामने आई एक घटना के बाद यही सवाल लोगों के मन में घूमने लगा है। गांव-कस्बों से लेकर सोशल मीडिया तक चर्चा है कि कहीं स्मार्टफोन से निकलने वाली किरणें बच्चों की सेहत के लिए खतरा तो नहीं बन रहीं।
दरअसल, अमरोहा के मंडी धनोरा थाना क्षेत्र के जुझैला चक गांव में चौथी कक्षा में पढ़ने वाले एक बच्चे की अचानक मौत हो गई। बताया जा रहा है कि बच्चा घर में पलंग पर बैठकर काफी देर से मोबाइल फोन पर रील देख रहा था। घर के बाकी सदस्य अपने कामों में व्यस्त थे। इसी दौरान बच्चा अचानक पलंग से लुढ़ककर नीचे गिर पड़ा।
परिजन घबरा गए और तुरंत उसे नज़दीकी अस्पताल लेकर पहुंचे। डॉक्टरों ने जांच के बाद बच्चे को मृत घोषित कर दिया। यह खबर सुनते ही परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा और पूरे गांव में डर का माहौल फैल गया।
कम उम्र में मौत ने बढ़ाई चिंता
रिपोर्ट्स के मुताबिक, बच्चे की उम्र लगभग 10 साल थी। डॉक्टरों ने शुरुआती जांच के आधार पर मौत का कारण हार्ट अटैक बताया, हालांकि यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि इसका मोबाइल फोन से कोई सीधा संबंध था या नहीं। चूंकि बच्चे का पोस्टमॉर्टम नहीं कराया गया, इसलिए मौत की असली वजह अब सामने आना संभव नहीं है।
इस घटना ने लोगों को इसलिए भी झकझोर दिया है क्योंकि हाल के महीनों में “साइलेंट हार्ट अटैक” के कई मामले सामने आए हैं। सड़क पर चलते, जिम में कसरत करते, डांस करते या वाहन चलाते वक्त अचानक लोगों की जान चली जाने की खबरें आई हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन मामलों में पीड़ितों की उम्र अब केवल बुज़ुर्गों तक सीमित नहीं रही, बल्कि बच्चे और युवा भी इसकी चपेट में आ रहे हैं।
परिवार की कहानी
रिपोर्ट्स के अनुसार, जुझैला चक गांव में किसान दीपक कुमार अपने परिवार के साथ रहते हैं। उनके दो बेटे थे, जिनमें बड़ा बेटा चौथी कक्षा में पढ़ता था। 4 जनवरी की शाम करीब 5 बजे वह घर में मोबाइल फोन पर वीडियो देख रहा था। अचानक उसकी तबीयत बिगड़ी और वह बेहोश होकर गिर पड़ा। परिवार उसे तुरंत अस्पताल ले गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। बिना पोस्टमॉर्टम के ही बच्चे का अंतिम संस्कार कर दिया गया, जिससे अब यह तय कर पाना मुश्किल है कि मौत की वजह हार्ट अटैक थी या कोई और गंभीर मेडिकल कारण।
क्या मोबाइल फोन से हार्ट अटैक हो सकता है?
मोबाइल फोन से निकलने वाली तरंगों को वैज्ञानिक भाषा में गैर-आयनकारी विकिरण (Non-Ionizing Radiation) कहा जाता है। जब हम कॉल करते हैं, इंटरनेट चलाते हैं या वीडियो देखते हैं, तो फोन मोबाइल टावरों से रेडियो फ्रीक्वेंसी तरंगों का आदान-प्रदान करता है। टावर से दूरी के हिसाब से इन तरंगों की तीव्रता बदलती रहती है। कई वैज्ञानिक शोधों में यह बात सामने आई है कि लंबे समय तक मोबाइल रेडिएशन के संपर्क में रहने से शरीर पर धीरे-धीरे नकारात्मक असर पड़ सकता है। कुछ अध्ययनों में यह भी कहा गया है कि इससे शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ सकता है, जिससे ब्लड प्रेशर और दिल की धड़कन पर असर पड़ता है।
रिसर्च यह भी संकेत देती है कि इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड दिल के ऑटोनॉमिक सिस्टम को प्रभावित कर सकता है, जो अपने आप दिल की धड़कन को नियंत्रित करता है। इससे धड़कन का अनियमित होना, सीने में दर्द या गंभीर मामलों में अचानक हृदयगति रुकने जैसी स्थितियां बन सकती हैं। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी साफ करते हैं कि अब तक ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है जो यह पक्के तौर पर साबित करे कि मोबाइल फोन सीधे तौर पर हार्ट अटैक का कारण बनते हैं, खासकर बच्चों में।
अमरोहा की घटना पर अभी भी सवाल
अमरोहा में हुई इस दुखद घटना के पीछे मोबाइल फोन की भूमिका थी या नहीं, यह अब शायद कभी साफ न हो पाए। पोस्टमॉर्टम न होने की वजह से मौत का वास्तविक कारण रहस्य बना हुआ है। लेकिन इतना तय है कि इस घटना ने माता-पिता और समाज को बच्चों की सेहत, जीवनशैली और मोबाइल के बढ़ते इस्तेमाल पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया है।


