ब्रिटेन के कंज़र्वेटिव सांसद बॉब ब्लैकमैन का हालिया बयान कि पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और पाकिस्तान के नियंत्रण वाले क्षेत्र अवैध कब्ज़े में हैं सिर्फ एक सांसद की व्यक्तिगत राय भर नहीं है। यह उस धीमी लेकिन निर्णायक नैरेटिव-शिफ्ट का संकेत है, जो पिछले कुछ वर्षों में पश्चिमी लोकतंत्रों के भीतर आकार ले रही है। लंबे समय तक कश्मीर को ‘विवाद’ या ‘मानवाधिकार’ के एकतरफा फ्रेम में देखा गया; अब उसे सीमा-पार आतंकवाद और उसके दुष्परिणामों के संदर्भ में देखा जाने लगा है।
1990 के दशक में कश्मीरी पंडितों का सामूहिक पलायन, मंदिरों-घरों का विध्वंस और चुन-चुन कर की गई हिंसा की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उतनी गंभीर चर्चा कभी नहीं हुई जितनी होनी चाहिए थी। बॉब ब्लैकमैन जैसे सांसदों का लगातार यह कहना कि कश्मीर की कहानी विस्थापन और आतंक के शिकार नागरिकों के बिना अधूरी है, विश्व पटल पर भारत की छवि बदलने की कहानी है। बॉब साफ शब्दों में दुनिया को याद दिलाते हैं कि कश्मीर की कहानी सिर्फ नक्शों की नहीं, लोगों के उजड़ने की कहानी भी है।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि बॉब ब्लैकमैन का यह रुख नया नहीं है। इसलिए उनके बयान को किसी तात्कालिक प्रतिक्रिया या भावनात्मक टिप्पणी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वे लगातार यह कहते रहे हैं कि कश्मीर में समस्या की जड़ आतंकवाद है, न कि केवल राजनीतिक मतभेद। यही वह बिंदु है जहाँ भारत की कूटनीति और जमीनी यथार्थ, पश्चिमी राजनीतिक बहस से अब जुड़ते दिखाई देते हैं। पश्चिमी बहसों में अब एक अहम फर्क दिखने लगा है। पहले कश्मीर की चर्चा इस तरह होती थी मानो सुरक्षा और आम लोगों के अधिकार एक-दूसरे के खिलाफ हों। अब धीरे-धीरे यह समझ बन रही है कि जब हिंसा और डर का माहौल हो, तो सबसे पहले आम नागरिकों के अधिकार ही खत्म होते हैं। आतंकवाद खुद इंसानी गरिमा और जीवन के अधिकार पर सबसे बड़ा हमला होता है। इस बात को स्वीकार किया जाना ही असली बदलाव है।
यह ज़रूरी है कि इस पूरे मामले को सही संतुलन के साथ देखा जाए। बॉब ब्लैकमैन का बयान ब्रिटिश सरकार की आधिकारिक नीति नहीं है। सरकारें अपनी विदेश नीति अलग ढंग से तय करती हैं। लेकिन संसद में उठने वाली आवाज़ें यह जरूर बताती हैं कि सोच किस दिशा में जा रही है। जब किसी लोकतंत्र की संसद में भारत के पक्ष में ऐसे स्वर सुनाई देने लगें, तो उसका कूटनीतिक महत्व अपने-आप बढ़ जाता है।
पाकिस्तान के लिए यह स्थिति सहज नहीं है। वर्षों से उसका यह प्रयास रहा है कि कश्मीर को एक अधूरे विवाद के रूप में पेश किया जाए और हिंसा की जिम्मेदारी से बचा जाए। लेकिन जब पश्चिमी देशों के सांसद यह कहने लगें कि सीमा पार से आने वाली हिंसा ही असली समस्या है, तो यह सोच कमजोर पड़ती है। इससे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की दलीलें उतनी असरदार नहीं रह जातीं।
भारत के लिए भी यह समय केवल संतोष करने का नहीं है। अंतरराष्ट्रीय समर्थन तभी मजबूत रहेगा, जब ज़मीन पर हालात बेहतर होते दिखें। कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ मजबूत हों, लोगों को रोज़गार और सुरक्षा का भरोसा मिले और आम नागरिक यह महसूस करें कि शांति उनके जीवन को सच में बेहतर बना रही है। दुनिया सिर्फ शब्दों से नहीं, हालात देखकर भी राय बनाती है।
एक और बात साफ है—आम लोगों के अधिकार और सुरक्षा को अलग-अलग खानों में नहीं रखा जा सकता। जब हिंसा खत्म होगी, तभी लोगों के अधिकार सुरक्षित होंगे। इस सच्चाई को अब पश्चिमी सोच में भी धीरे-धीरे जगह मिल रही है, और यही इस पूरे बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। दरअसल बॉब ब्लैकमैन का बयान किसी एक देश की जीत या हार का मामला नहीं है। यह इस बात की याद दिलाता है कि आतंकवाद पर दोहरा नजरिया नहीं होना चाहिए और इतिहास के पीड़ितों को भुलाया नहीं जाना चाहिए। कश्मीर को केवल विवाद कहकर टाल देना आसान है, लेकिन वहां के लोगों की पीड़ा को समझकर समाधान की बात करना ज़रूरी है।
आज असली सवाल यह नहीं है कि किस सांसद ने क्या कहा। असली सवाल यह है कि दुनिया अब कश्मीर को किस नज़र से देख रही है। अगर आतंकवाद, इतिहास और आम लोगों की पीड़ा को साथ रखकर बात होगी, तो कश्मीर पर वैश्विक चर्चा का स्वर भी बदलेगा। बॉब ब्लैकमैन का बयान उसी बदलाव की ओर इशारा करता है।
अनुरंजन झा,
चेयरमैन, गांधियन पीस सोसायटी, ब्रिटेन


