(रिपोर्ट थोड़ी लंबी है लेकिन आपके और आपके परिवार के सेहत के लिए बहुत जरूरी है इसलिए थोड़ा वक्त निकाल कर पढ़िए जरूर। दुनिया भर के डॉक्टर्स और रिसर्चर्स की रिपोर्ट्स का सार है और उन रिपोर्ट की डिटेल आलेख के अंत में दिया गया है।)
भारत में एक नया ट्रेंड—या कहें नया स्कैम—तेज़ी से आकार ले रहा है: #Alkaline_Water। इसकी पटकथा वही पुरानी है, जो कभी रिफाइंड तेल के साथ लिखी गई थी। फर्क बस इतना है कि इस बार निशाने पर पानी है, जीवन का मूल। उदारीकरण के बाद भारत एक विशाल बाज़ार बना। उसी दौर में यह नैरेटिव गढ़ा गया कि शुद्ध घी और सरसों का तेल सेहत के लिए नुकसानदेह हैं। कोलेस्ट्रॉल, दिल की बीमारी, मोटापा। इसके बरअक्स “हल्का”, “हार्ट-फ्रेंडली” बताकर रिफाइंड तेल उतारा गया। पश्चिमी देशों को भारत की आबादी एक बाजार के तौर पर दिखती तो है साथ ही उसे ये भी लगता है कि इस आबादी में किस तरह का डर पैदा किया जाए ताकि पूरे बाजार पर नियंत्रण हो सके।
90 के दशक के मध्य में भारत जब दुनिया भर के लिए खुल रहा था। उस वक्त इतनी बड़ी आबादी को गिरफ्त में करने के लिए कुछ ऐसी स्ट्रेटजी चाहिए थी जो स्लो प्वाइजन की तरह भारत के हर घर में घुस जाए। दवाओं और अस्पताल का ऐसा बाजार खड़ा किया जाने लगा जिसे आप विकास की नई ऊंचाई कहकर गर्वान्वित होते रहें। लेकिन आखिर ये बाजार चलता कैसे ? जाहिर है इस बाजार को खड़ा करने के लिए देश को बीमार करना जरूरी था और पिछले 25-30 सालों में ये साफ हो चुका है कि रिफाइँड तेल के जरिए घर घर में तरह तरह की बीमारियां पहुंचाई गईं।
भारत में “सेहत” अब सिर्फ़ जीवन-शैली नहीं रही वह एक मार्केटिंग भाषा बन चुकी है और जिस दिन से “भय” को विज्ञापन की सबसे असरदार धुन बना दिया गया, उसी दिन से हर नई बोतल, हर नया पैक, हर नया दावा एक संभावित “उद्योग” बन गया। आज वही पटकथा एक बार फिर हमारे सामने है। इस बार मंच पर #Alkaline_Water है। दावा वही पुराना: “यह बेहतर है, यह शुद्ध है, यह रोग-रोधी है, यह शरीर का pH बदल देगा, यह डिटॉक्स करेगा।” वगैरह वगैरह। सवाल वही ज़रूरी: किसके लिए बेहतर? किस प्रमाण से बेहतर? और किस कीमत पर? अब जब रिफाइंड तेल के फ्रॉड की कलई खुल चुकी है, बाजार बनाने वालों की नजर सीधे पानी पर पड़ी है। पानी एक ऐसी चीज है जिसके बिना जीवन की कल्पना असंभव है और जब पश्चिमी देशों को लगा कि जो देश रिफाइंड के झांसे में अपने घी-तेल छोड़ सकता है वो पानी के लिए तो किसी हद तक जा सकता है। दिलचस्प ये है कि जो देश भारत में पानी को जहरीला बता रहे हैं अल्कलाइन वाटर या उस जैसे दूसरे पानी पीने की सलाह दे रहे हैं वो खुद अपने देश में सीधे नलों के जरिए घर घर पहुंचने वाले पानी को सबसे शुद्ध मानते हैं और बड़े शान से कहते हैं We use tap water ।
मैं इसे किसी एक ब्रांड या कंपनी का आरोप बनाकर नहीं देखता। मैं इसे एक बाज़ार-रचना (market-making) की प्रक्रिया की तरह देखता हूँ, जहाँ पहले आम आदमी की रोज़मर्रा की चीज़ को “कमतर” ठहराया जाता है, फिर “नया समाधान” बेचा जाता है, और अंत में उसी समाधान के आसपास एक पूरा इकोसिस्टम खड़ा हो जाता है, यानी सप्लीमेंट, टेस्ट, दवाइयाँ, क्लीनिक, इंफ्लुएंसर, और “एक्सपर्ट”। भारत जैसे देश में, जहाँ स्वच्छ पानी की उपलब्धता खुद एक सामाजिक-राजनीतिक मुद्दा है, वहाँ पानी को “हेल्थ प्रोडक्ट” बनाकर बेचना सिर्फ़ व्यापार नहीं, स्वास्थ्य-नीति पर असर डालने वाली भी प्रक्रिया है। इस प्रकिया में सबसे खतरनाक हैं “एक्सपर्ट्स” जो डिजिटल माध्यम का जितना दुरुपयोग कर सकते हैं कर रहे हैं। व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी से सिर्फ राजनीतिक ज्ञान ही खराब नहीं होता नीम हकीम के भी खतरे बने रहते हैं।
अब ज़रा तथ्यों की जमीन पर आएँ। अल्कलाइन पानी का सबसे लोकप्रिय दावा यह है कि वह शरीर की “एसिडिटी” घटाता है और शरीर को “अल्कलाइन” बनाकर बीमारी रोकता है। पर जीवविज्ञान की पहली किताब बताती है कि खून का pH, शरीर स्वयं बहुत सख्ती से नियंत्रित करता है। मुख्यतः फेफड़ों और किडनी के जरिए। यह कोई ढीली-ढाली चीज़ नहीं कि आप एक बोतल पीएँ और शरीर का सिस्टम रातोंरात बदल जाए। दुनिया भर में हर छोटी बड़ी चीजों पर रिसर्च होते रहते हैं, बाजार को नियंत्रित करने वाले उऩ्हीं रिसर्च में से अपने काम भर के प्वाइंट्स निकाल कर उन्ही को प्रचारित करना शुरु करते हैं। उदाहरण के लिए आपको बताएं कि दुनिया की मशहूर Respiratory reflux expert ( सांस से जुड़े रिफ्लक्स रोगों की विशेषज्ञ जो पिछले 50 सालों से दुनिया भर को अपने रिसर्च से अवगत करा रही हैं) डॉ.जेमी कॉफमैन ने 2012 में एक रिपोर्ट पब्लिश की जिसमें कहा कि pH 8.8 वाला अल्कलाइन पानी पेप्सिन (acid reflux में भूमिका निभाने वाला एंज़ाइम) को निष्क्रिय कर सकता है अगर बाकी दवाइयों के साथ साथ इसे भी सीमित मात्रा में इस्तेमाल किया जाए। बाद में इसी रिपोर्ट को आधार बना कर कुछ बाजारू संस्थाओँ ने ये साबित करने की कोशिश की अल्कलाइन वाटर बीमारियों को ठीक करने में कारगर है। उनका बाजार चल निकला लेकिन इस गोरखधंधे को समझने वालों का ध्यान उधर गया। नतीजा ये हुआ कि दुनिया के अलग अलग देशों के 7 डॉक्टरों और रिसर्चर्स ने जिनमें जापान, इंडोनेशिया से लेकर अमेरिका तक के लोग शामिल थे, ने गहन अध्ययन और प्रयोग के बाद 2022 में ये निष्कर्ष निकाला कि बाज़ार में बिक रहे alkaline water, oxygenated water और demineralized water सामान्य मिनरल वॉटर की तुलना में कोई अतिरिक्त ठोस फायदा नहीं देते हैं बल्कि लंबे समय तक इन पानी के नुकसान के स्पष्ट सबूत मौजूद हैं। पानी के साथ खेल नहीं होना चाहिए क्यूंकि ये सीधे शरीर के इलेक्ट्रोलाइट्स, पाचन और किडनी-फंक्शन तक जाता है। यानी विज्ञान कहता है कि ये कोई “चमत्कार” नहीं हो रहा इसलिए सावधानी” जरूरी है। उन्होंने साफ साफ कहा कि पानी प्रकृति में कभी “शुद्ध H₂O” नहीं होता। उसमें कैल्शियम, मैग्नीशियम और बाइकार्बोनेट जैसे खनिज होते हैं और यही उसे पीने योग्य बनाते हैं। प्रयोगों में पाया गया कि ऐसे पानी से पेशाब बढ़ता है, शरीर से सोडियम-पोटैशियम-कैल्शियम-मैग्नीशियम बाहर निकलते हैं, थकान, ऐंठन और दिल की धड़कन तक प्रभावित हो सकती है। लंबी अवधि में हड्डियों, हार्मोन और गर्भावस्था पर भी असर दिखा। इसलिए WHO ने न्यूनतम TDS और कैल्शियम/मैग्नीशियम की सिफारिशें दीं। यानी पानी “खाली” नहीं, पोषक होना चाहिए।
इन्होंने WHO की 1980 की ऐतिहासिक रिपोर्ट का भी हवाला दिया जिसमें साफ चेताया था कि पूरी तरह मिनरल-रहित (डिस्टिल्ड/RO) पानी शरीर के पानी-नमक संतुलन को बिगाड़ सकता है। सिर्फ पीने में ही नहीं, खाना पकाने में भी सॉफ्ट या RO पानी नुकसान कर सकता है। ऐसे पानी से खाना बनाने पर सब्ज़ियों और दालों में मौजूद जरूरी खनिज लगभग 60% तक नष्ट हो सकता है। मतलब साफ़ है—RO सिर्फ पानी को नहीं, आपकी थाली को भी पोषण में गरीब बना देता है। इतना ही नहीं, कम खनिज वाला पानी पाइपों से धातुएँ ज़्यादा घोलता है, जिससे सीसा जैसी ज़हरीली धातुओं के शरीर में जाने का खतरा बढ़ जाता है। यह कोई डर फैलाने की बात नहीं है, बल्कि विज्ञान की सच्चाई है।
फिर आया अल्कलाइन पानी जिसके साथ दावे और ऊँचे हुए। पर 2000–2022 तक की सिस्टमेटिक रिव्यू बताती है कि स्वस्थ लोगों में अल्कलाइन या “ऑक्सीजनयुक्त” पानी ने खून के pH, आंतों के बैक्टीरिया, फिटनेस या मूत्र-pH पर कोई ठोस अतिरिक्त लाभ नहीं दिखाया। उलटे डी-मिनरलाइज़्ड पानी का लंबा उपयोग नुकसानदेह सिद्ध हुआ। यानी विज्ञान फिर वही कह रहा है: साधारण मिनरल पानी ही पर्याप्त है। अब इनके दावे सुनिए—अल्कलाइन पानी “डिटॉक्स” करता है, “कैंसर रोकता” है, “एसिडिटी खत्म” करता है। जो कि सरासर झूठ है।
इस पूरी बहस में Kangen (कैनगन) Water जैसे ब्रांड खास हैं, क्योंकि वे पानी को सिर्फ एक उत्पाद नहीं, बल्कि एक विचारधारा और नेटवर्क के रूप में बेचते हैं। महंगी आयोनाइज़र मशीनें, कई pH मोड, “लिविंग वाटर”, “डिटॉक्स”, “एंटी-एजिंग” शब्द आकर्षक हैं, दावे बड़े हैं। लेकिन अक्सर यहाँ पानी से ज़्यादा उम्मीद और कमाई का सपना बेचा जाता है। यह ढांचा आम तौर पर MLM (मल्टी-लेवल मार्केटिंग) पर टिका होता है जहाँ प्रोडक्ट बेचने से ज़्यादा ज़ोर लोग जोड़ने पर होता है। जितनी बड़ी आपकी नीचे की टीम, उतनी बड़ी ऊपर की कमाई। यानी, पानी पीछे और नेटवर्क आगे। Kangen को बेचने वाली कंपनी Enagic का मॉडल भी इसी नेटवर्क-आधारित बिक्री से जोड़ा जाता है।
समस्या तब शुरू होती है जब सेहत के दावे इलाज की तरह पेश किए जाने लगते हैं जब पानी को दवा का विकल्प बताया जाता है, बीमारियों से मुक्ति और उम्र थाम लेने के वादे किए जाते हैं। जबकि प्रमुख मेडिकल और वैज्ञानिक संस्थाओं ने ऐसे “चमत्कारी” दावों को कभी मान्यता नहीं दी। सवाल पानी पीने का नहीं है; सवाल विज्ञान और ईमानदार जानकारी का है। सेहत को सपनों और नेटवर्क की भाषा में बेचना, अंततः उपभोक्ता को भ्रमित ही करता है।
रिफाइंड तेल से लेकर #Alkaline_Water, कैनगन पानी तक, पैटर्न एक ही है:
साधारण चीज़ को संदिग्ध बनाओ, नया समाधान बेचो और फिर उसके चारों ओर कहानी रचो। याद करिए रिफाइंड तेल में पहले नैरेटिव बना, फिर आदत बनी। रिफाइंड तेल की बहस कई परतों वाली है, ट्रांस फैट, डीप-फ्राई, बार-बार तेल गरम करना, और प्रोसेसिंग में बनने वाले यौगिक। भारत में इसे “कल्पना” मानकर नहीं छोड़ा गया; FSSAI ने 2022 तक ट्रांस फैट को 2% तक सीमित करने के नियम बनाए। मतलब साफ है कि जोखिम थे, इसलिए रेगुलेशन आया। सवाल ये उठता है कि जब जोखिम थे तब देश की रेगुलेटरी संस्थाएं क्या कर रही थीं। 30 साल नियम बनाने में क्यूं लगे। अंतरराष्ट्रीय खाद्य-विज्ञान में यह भी दर्ज है कि रिफाइनिंग/डीओडोराइज़ेशन के दौरान कुछ प्रोसेस कंटैमिनेंट्स (जैसे 3-MCPD एस्टर्स और glycidyl esters) बन सकते हैं। इसी क्रम में glycidol को IARC ने Group 2A (probably carcinogenic) में रखा है। “रिफाइंड तेल जितना ज़्यादा प्रोसेस्ड, जितना ज़्यादा री-हीटेड, जितना ज़्यादा डीप-फ्राई उतना जोखिम बढ़ता है। मार्केटिंग ने झूठ और डर बेचा। 1998 का ड्रॉप्सी विवाद तो याद ही होगा। भारत में खुले सरसों तेल का बड़ा बाजार था, उसे खराब बताया गया, रिफाइँड लाया गया साथ साथ पैकेज्ड की बात की गई, खुले तेल में जोखिम कहा गया लेकिन हुआ क्या देश की राजधानी दिल्ली में एक महीने में धारा के पैकेज्ड तेल से 60 लोगों की जान चली गई और 3000 से ज्यादा बीमार हुए, जांच हुई तो पता चला कि सरसों की बीज की तरह का दिखने वाला जहरीला बीज मिलाया गया था। ड्रॉप्सी विवाद ने हमें सिखाया कि मिलावट मारती है, तेल नहीं।
अब यही मॉडल पानी में देखिए। एक तरफ WHO ने सिखाया कि मिनरल-रहित पानी शरीर के खिलाफ जा सकता है। आधुनिक रिव्यू सिखाते हैं कि फैन्सी पानी साधारण मिनरल पानी से बेहतर अब तक सिद्ध नहीं हुआ। लेकिन भारत का बॉटल्ड वॉटर बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा है। 2025 में करीब 70 हजार करोड़ का जो 2030 तक 1 लाख 15 हजार करोड़ तक पहुंचने का अनुमान हैं। इसके साथ प्रीमियमाइज़ेशन बढ़ा है—मिनरल-रिच, वैल्यू-ऐडेड, अल्कलाइन—सबको “लाइफस्टाइल” बनाकर बेचा जा रहा है। ये वो बाजार है जिससे आपकी सेहत को कोई फायदा नहीं हो रहा है। कम या ज्यादा नुकसान ही हो रहा है। यानी यह सिर्फ स्वास्थ्य नहीं, उपभोक्ता मनोविज्ञान और ब्रांड अर्थव्यवस्था की बहस है। जब पानी स्टेटस बनता है, तो प्यास नहीं पहचान खरीदी जाती है, और तर्क पीछे छूट जाता है।
दुनिया भर के डॉक्टर्स और ईमानदार एक्सपर्ट्स की रिपोर्ट को महीनों तक पढ़ने के बाद मेरा अध्ययन जो सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है क्या अल्कलाइन पानी सीधे किडनी-लिवर की बीमारियाँ बढ़ाता है? विज्ञान इतने सीधे निष्कर्ष से शायद बचता है। लेकिन यह ज़रूर कहता है कि बहुत अधिक अल्कलाइन सेवन, किडनी समस्या, इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन जैसे जोखिम बढ़ा सकता है। जेमी कॉफमेन, निक्की जॉनस्टन, डियान नोविटा चंद्रा, के सी वर्मा, ए एस कुशवाहा और तो और फ्रंटिसेक कोजिसेक जिन्होंने 1980 की ऐतिहासिक WHO रिपोर्ट बनाई थी, भी इस बात पर मुतमईन हैं कि पानी को साधारण रखना और नैसर्गिक मिनरल के साथ रखना ही उचित है। #Alkaline_Water। के नाम पर सिर्फ बाजार खड़ा किया जा रहा है। इसलिए किसी भी हेल्थ-ट्रेंड को सार्वभौमिक सलाह की तरह बेचना गैर-जिम्मेदार है। दिक्कत तब बढ़ती है जब बाज़ार किसी चीज़ को “इलाज” की तरह बेचता है, लोग उसे “डोज़” की तरह लेने लगते हैं। पानी का धर्म प्यास बुझाना है; दवा बनना नहीं। जब तक डॉक्टर खास सलाह न दे।
बड़ी तस्वीर यह है कि बीमारी-आधारित अर्थव्यवस्था सिर्फ अस्पतालों से नहीं बनती; वह रोज़मर्रा की चीज़ों, भोजन, पानी, नींद, तनाव को मेडिकल समस्या बनाकर भी बनती है। इसलिए हमारी भूमिका किसी ब्रांड के खिलाफ नहीं, बल्कि विज्ञान के पक्ष में और उपभोक्ता के हित में होनी चाहिए। डर से नहीं, डेटा से।
अंत में यही कहना चाहूंगा कि भारत को दो मोर्चों पर सजग होना होगा—
(1) पानी की वास्तविक सुरक्षा: नगरपालिका, पाइपलाइन, भूजल, प्रदूषण, माइक्रोबियल जोखिम।
(2) पानी की मार्केटिंग: pH के चमत्कार, डिटॉक्स के दावे, रोग-रोधी घोषणाएँ इन पर वैज्ञानिक कसौटी और नियम आधारित निगरानी।
वरना गरीब और मध्यम वर्ग दोहरी मार झेलेगा पहले असुरक्षित पानी, फिर महँगी “सेहत वाली बोतल” का दबाव। मैं यह नहीं कहता कि अल्कलाइन पानी की बोतल उठाना अपराध है। मैं यह कहता हूँ कि जहाँ हर नया ट्रेंड उपचार बनाकर बेचा जाए, वहाँ नागरिक का पहला धर्म सवाल है: किस अध्ययन में, कितने लोगों पर, कितने समय तक, किस नतीजे के साथ? दावा लक्षण का है या इलाज का? कीमत बढ़ी है या समझ? शरीर का pH बदलने से पहले, सोच का pH बदलिए—डर कम कीजिए, तर्क और प्रमाण बढ़ाइए। क्योंकि विज्ञान का एक ही मंत्र है: extraordinary claims need extraordinary evidence. अल्कलाइन पानी का दावा असाधारण है। सबूत भी वैसा ही होना चाहिए। अभी तक, वह सबूत विज्ञापन से भारी नहीं दिखता।
रेफ्रेंस के तौर पर कुछ मुख्य रिपोर्ट्स और वैज्ञानिकों के नाम दे रहा हूं।
- Health effects of alkaline, oxygenated, and demineralized water compared to mineral water among healthy population: a systematic review
- Fatty acid esters of 3-MCPD: Overview of occurrence and exposure estimates
- Demineralization of drinking water: Is it prudent?
- Health risks from drninking demineralised water
- Potential harm and benifits of pH 8.8 alkaline drinking water as an adjunct in the treatment of reflux disease
Experts: Jamie A Koufman, Nikki Johnston, Diana Sunardi, Dian Novita Chandra, Bernie Endyarni Medise, Nurul Ratna Mutu Manikam, Dewi Friska, Wiji Lestari, Putri Novia, Choiri Insani, KC Verma , AS Kushwaha , Frantisek KOZISEK.
– अनुरंजन झा,
चेयरमैन, गांधियन पीस सोसायटी, ब्रिटेन


