कभी ऐसा हुआ है कि आप रात में आराम से सोए हों, लेकिन अचानक कोई अजीब-सा सपना आया और आप हड़बड़ाकर उठ गए? दिल तेज़ धड़कने लगा, सांसें भारी हो गईं और एक अनजाना-सा डर मन में बैठ गया। या फिर स्टोर रूम में कुछ ढूंढते हुए आपने बल्ब जलाया हो और अचानक लाइट चली गई हो। चारों तरफ़ घुप्प अंधेरा और उसी पल डर का एहसास। या टीवी पर कोई डरावनी फिल्म या साइकोलॉजिकल थ्रिलर देख ली हो, और उसके बाद अगले कुछ दिन मन में अजीब-सी बेचैनी बनी रही हो।
ये तीनों ही हालात ऐसे हैं, जिनसे हम सभी कभी न कभी गुज़रते हैं। इसके अलावा, परीक्षा से पहले डर लगना, रिज़ल्ट देखने से पहले घबराहट होना, या बॉस का गुस्से में अचानक बुला लेना ये सब भी बहुत आम अनुभव हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब डर लगता है, उस वक्त हमारे दिमाग के अंदर क्या चल रहा होता है? शरीर इस डर पर कैसे प्रतिक्रिया देता है? आज हम यही समझेंगे डर का हमारे दिमाग और शरीर पर तुरंत क्या असर पड़ता है। डर अगर लंबे समय तक बना रहे, तो सेहत पर इसका क्या प्रभाव होता है। कौन-सा डर सामान्य है, कब सतर्क होने की ज़रूरत है और डर को संभालने के आसान तरीके क्या हैं। जैसे ही डर महसूस होता है, शरीर तुरंत सर्वाइवल मोड में चला जाता है। दिल की धड़कन तेज़ हो जाती है, सांसें तेज़-तेज़ चलने लगती हैं, मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं और पसीना आने लगता है। दिमाग का अमिग्डाला हिस्सा एक अलार्म की तरह एक्टिव हो जाता है, जो खतरे का संकेत देता है।
इसी दौरान सोचने-समझने वाला हिस्सा, जिसे प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स कहा जाता है, थोड़ी देर के लिए पीछे चला जाता है। यही वजह है कि डर के समय हम घबरा जाते हैं, ठीक से सोच नहीं पाते और कई बार बिना सोचे-समझे तुरंत प्रतिक्रिया दे देते हैं। भले ही खतरा असली न हो, शरीर फिर भी उसी तरह रिएक्ट करता है क्योंकि उसका मकसद सिर्फ हमें बचाना होता है।
अगर डर या चिंता लंबे समय तक बनी रहे, तो इसका असर सेहत पर पड़ने लगता है। नींद की क्वालिटी बिगड़ जाती है, सिरदर्द, पेट की समस्या, थकान और चिड़चिड़ापन बढ़ने लगता है। मानसिक स्तर पर बेचैनी, घबराहट, आत्मविश्वास में कमी और उदासी का खतरा बढ़ जाता है। लगातार डर में रहने से शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी कमजोर हो सकती है, जिससे बार-बार बीमार पड़ने की संभावना बढ़ जाती है। जब डर रोज़मर्रा की ज़िंदगी में रुकावट बनने लगे, तो वो सिर्फ एक भावना नहीं रह जाता, बल्कि एक समस्या बन जाता है।
नया काम शुरू करते समय, परीक्षा देने से पहले, इंटरव्यू में या किसी अनजान स्थिति का पहली बार सामना करते समय डर लगना बिल्कुल स्वाभाविक है। ऐसा डर सामान्य होता है और समय के साथ कम हो जाता है। लेकिन अगर डर बिना किसी ठोस वजह के बार-बार आए, बहुत ज़्यादा हो, या महीनों तक बना रहे, तो इसे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। अगर डर की वजह से आप बाहर जाना, काम करना या लोगों से मिलना कम कर दें, तो ये सामान्य स्थिति नहीं है। अगर बार-बार घबराहट के दौरे आएं, सांस लेने में दिक्कत हो, चक्कर आएं या बहुत ज़्यादा बेचैनी महसूस हो, तो प्रोफेशनल मदद लेना ज़रूरी हो जाता है। मदद लेना कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी सेहत को समझने और संभालने की समझदारी है।
डर को मैनेज कैसे करें?
सबसे पहले अपने डर को पहचानें और उसे स्वीकार करें। डर को दबाने की कोशिश न करें।
डर कम करने के लिए धीमी और गहरी सांसें लें।
4-6-8 ब्रीदिंग एक्सरसाइज़ अपनाएं
4 सेकंड में सांस अंदर लें,
6 सेकंड तक सांस रोककर रखें,
और 8 सेकंड में धीरे-धीरे सांस छोड़ें।
अपने दिमाग को बार-बार याद दिलाएं कि आप सुरक्षित हैं।
खान-पान में कैफीन और ज़्यादा चीनी से दूरी बनाएं।
पूरी नींद लें और रोज़मर्रा की दिनचर्या को संतुलित रखें।
अगर इसके बावजूद डर बार-बार लौटता रहे, तो किसी प्रोफेशनल से बात करना मददगार हो सकता है। बात करने से डर हल्का पड़ता है और मन को सुकून मिलता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें दी गई जानकारी किसी भी प्रकार की चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं है। यदि डर, घबराहट या चिंता लंबे समय तक बनी रहे या रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित करे, तो किसी योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें।


