पटना के शंभू गर्ल्स हॉस्टल में NEET की तैयारी कर रही एक छात्रा की संदिग्ध मौत का मामला अब सिर्फ “क्राइम स्टोरी” नहीं रहा। यह हमारे सिस्टम की एक एक्स-रे रिपोर्ट बन गया है, जहाँ इलाज, पुलिसिंग और जांच की पूरी कड़ी पर सवाल खड़े हैं। शुरुआती चरण में पुलिस की तरफ से आत्महत्या/ओवरडोज जैसी बातों का संकेत, फिर पोस्टमार्टम आने के बाद मामले की दिशा बदलने का क्रम बताता है कि हम अक्सर सच तक नहीं, “सहूलियत” तक जल्दी पहुँच जाते हैं। इस बलात्कार के बाद हुई मौत ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि हम अपराध को कैसे देखते हैं और उससे निपटते कैसे हैं। यह पूरे सिस्टम की परीक्षा है जिसमें अस्पताल, पुलिस, हॉस्टल प्रबंधन और प्रशासन सब शामिल हैं।
ऐसे मामलों में सबसे निर्णायक भूमिका शुरुआती प्रतिक्रिया की होती है। छात्रा को अस्पताल ले जाया जाना ज़रूरी था, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी था कि उसे मेडिको-लीगल केस मानकर देखा जाए। चोटों का वैज्ञानिक रिकॉर्ड, समय पर नमूनों का संग्रह, और परिवार को स्पष्ट जानकारी, ये सब किसी औपचारिकता नहीं, बल्कि न्याय की पहली सीढ़ियाँ हैं। जब इन सीढ़ियों पर ही चूक होती है, तो ऊपर जाकर सच तक पहुँचना कठिन हो जाता है।
दूसरा सवाल पुलिस की शुरुआती कार्रवाई पर है। किसी भी संदिग्ध मौत को जल्दबाज़ी में आत्महत्या बताना जांच नहीं, सुविधा होती है। हर संदिग्ध मौत को तुरंत “सुसाइड” मान लेना प्रशासन की आदत बनती जा रही है। यह आदत बंद होनी चाहिए। “संदिग्ध मौत” का अर्थ है पहले सबूत, बाद में निष्कर्ष और यही जांच का मूल सिद्धांत है। लेकिन अक्सर उल्टा होता है: निष्कर्ष पहले तय हो जाता है, सबूत बाद में उसी के अनुसार ढाले जाते हैं। यही वह बिंदु है जहाँ सिस्टम की विश्वसनीयता कमजोर पड़ती है। और जब भरोसा टूटता है, तो लोग सड़कों पर उतरते हैं, राजनीति प्रवेश करती है, और न्याय की प्रक्रिया और जटिल हो जाती है।
तीसरा आयाम है, हॉस्टल और कोचिंग का इकोसिस्टम। देश के हर बड़े शहर में शिक्षा के नाम पर हॉस्टल और पीजी का एक विशाल बाजार खड़ा है। सुरक्षा, निगरानी, विजिटर रजिस्टर, महिला स्टाफ, आपातकालीन व्यवस्था, कागज़ पर सब कुछ है, लेकिन ज़मीन पर अक्सर कुछ भी नहीं। जब कोई हादसा होता है, तो जिम्मेदारी तय करने की जगह आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो जाते हैं। सवाल यह नहीं कि एक हॉस्टल दोषी है या नहीं, सवाल यह है कि क्या पूरे सिस्टम का ऑडिट होगा, या मामला ठंडा पड़ने दिया जाएगा।
यहाँ एक और असहज लेकिन ज़रूरी सवाल उठता है कि हम अपने सामाजिक नारों को कहाँ ग़लत समझ रहे हैं? वर्षों से हम कहते आए हैं “बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ।” नारा अच्छा है, भावना सही है, लेकिन अधूरा है। बेटियाँ खुद अपने लिए सबसे बड़ा ख़तरा नहीं हैं। खतरा बेटों से है। यौन हिंसा के अपराध बेटियाँ नहीं करतीं, बेटे करते हैं।
इसीलिए मैं हमेशा कहता हूँ—
“बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ” नहीं, बल्कि
“बेटा पढ़ाओ और बेटी बचाओ।”
अगर समाज को बदलना है, तो संस्कार बेटों में देने होंगे। सम्मान, सहमति और संवेदनशीलता की शिक्षा लड़कों को बचपन से देनी होगी। कानून अपराध के बाद काम आता है, संस्कार अपराध से पहले। जब तक हम इस बुनियादी सच को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक हर घटना के बाद हम मोमबत्तियाँ जलाते रहेंगे और अगली घटना का इंतज़ार करते रहेंगे।
यह मामला यह भी बताता है कि जांच की पारदर्शिता क्यों ज़रूरी है। जब शुरुआती जांच पर सवाल उठते हैं, तो विशेष जांच टीम, वरिष्ठ अधिकारियों और नई रिपोर्टों की मांग स्वाभाविक हो जाती है। लेकिन जांच तभी भरोसा पैदा करती है जब वह दिखे। कौन-से फोरेंसिक कदम उठे, क्या-क्या जांचा गया, और क्या-क्या अभी जांच के दायरे में है। गोपनीयता और पारदर्शिता के बीच संतुलन बनाना प्रशासन की जिम्मेदारी है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस तरह की घटनाएँ उन हज़ारों लड़कियों के मन में डर भर देती हैं जो छोटे शहरों और गाँवों से बड़े शहरों में सपने लेकर आती हैं। अगर शिक्षा के शहर ही असुरक्षित होंगे, तो विकास का दावा खोखला हो जाएगा। यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक भरोसे का सवाल है।
आज ज़रूरत इस बात की है कि इस केस को एक उदाहरण बनाया जाए, दिखाया जाए कि सिस्टम अपनी गलती स्वीकार कर सकता है, उसे सुधार सकता है और दोषियों को सज़ा दिला सकता है। अस्पतालों की जवाबदेही तय हो, पुलिस की शुरुआती लापरवाही पर कार्रवाई हो, और हॉस्टल-कोचिंग व्यवस्था पर सख़्त निगरानी लागू हो।
लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है कि हम अपने समाज से यह सवाल पूछें कि हम अपने बेटों को क्या सिखा रहे हैं? अगर हमने बेटों को सम्मान देना नहीं सिखाया, तो बेटियों को बचाने के सारे नारे खोखले रहेंगे। एक छात्रा की जान वापस नहीं आएगी। लेकिन अगर इस मौत से सिस्टम बदला, संस्कार बदले और सोच बदली तो शायद यह त्रासदी किसी और बेटी की जान बचा सके। यही किसी समाज और किसी लोकतंत्र की असली कसौटी है।
अनुरंजन झा
चेयरमैन, गांधियन पीस सोसायटी, ब्रिटेन


