जोड़ों में दर्द और घुटनों की तकलीफ को पहले बुढ़ापे की निशानी माना जाता था। हाथ-पैर के जोड़ दुखने लगें तो यह समझ लिया जाता था कि उम्र का असर दिखने लगा है। लेकिन अब यह समस्या सिर्फ बुज़ुर्गों तक सीमित नहीं रह गई है। आजकल 30–35 साल की उम्र में ही लोग घुटनों और शरीर के दूसरे जोड़ों में दर्द की शिकायत करने लगे हैं। सवाल यह है कि इतनी कम उम्र में ऐसा क्यों हो रहा है? इसके पीछे क्या वजहें हैं? और इससे बचने के लिए रोज़मर्रा की किन गलतियों से बचना ज़रूरी है?
30 की उम्र में ही घुटनों और जोड़ों में दर्द क्यों?
रिपोर्ट्स ने बताया है कि 30 साल से कम उम्र के कई लोग घुटनों में दर्द या असहजता महसूस कर रहे हैं। अक्सर उन्हें यह डर सताने लगता है कि कहीं इतनी कम उम्र में गठिया तो नहीं हो गया। हालांकि, रिपोर्ट्स के मुताबिक इस उम्र में गठिया होना बहुत आम नहीं है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि युवाओं में घुटनों के दर्द की सबसे आम वजह पेटेलोफेमोरल पेन सिंड्रोम है। इस स्थिति में घुटने के आगे मौजूद छोटी हड्डी जिसे आम भाषा में कटोरी कहा जाता है अपनी सही पोज़ीशन में नहीं रहती। इसकी वजह से घुटनों में सूजन, घिसाव और दर्द शुरू हो जाता है।
कई मामलों में यह दर्द मांसपेशियों की कमजोरी या मसल इम्बैलेंस के कारण भी होता है। लंबे समय तक ज़मीन पर बैठना, बार-बार स्क्वैट करना, पालथी या चौकड़ी मारकर देर तक बैठना—ये सभी आदतें घुटनों पर ज़रूरत से ज़्यादा दबाव डालती हैं।
इसके अलावा, बहुत ज़्यादा सीढ़ियां चढ़ना-उतरना या पैरों के अलाइनमेंट में गड़बड़ी होना भी घुटनों के दर्द का खतरा बढ़ा सकता है।
राहत की बात
रिपोर्ट्स के अनुसार, इस तरह के घुटनों के दर्द का इलाज ज़्यादातर मामलों में आसान होता है। आमतौर पर इसमें सर्जरी की ज़रूरत नहीं पड़ती। इलाज का सबसे अहम हिस्सा फिजियोथेरेपी माना जाता है। इसमें कुछ खास मांसपेशियों को मजबूत किया जाता है और सही तरीके से बैठने, उठने और चलने की ट्रेनिंग दी जाती है। साथ ही, यह भी बताया जाता है कि किन पोज़ीशन्स और आदतों से दूरी बनानी चाहिए। ज़रूरत पड़ने पर कार्टिलेज को सपोर्ट करने वाले कुछ सप्लीमेंट्स भी दिए जाते हैं, जिससे समस्या धीरे-धीरे ठीक हो जाती है।
रोज़ की कौन-सी गलतियां अवॉयड करनी चाहिए?
रिपोर्ट्स बताती हैं कि ज़मीन पर बहुत देर तक पालथी या चौकड़ी मारकर बैठना घुटनों के दर्द की एक बड़ी वजह है। इस तरह बैठने से घुटने की आगे वाली हड्डी यानी नीकैप पर ज़्यादा दबाव पड़ता है। कई बार इसी दबाव के कारण नीकैप अपनी जगह से थोड़ा साइड में खिसक जाती है, जिससे घिसाव बढ़ता है और दर्द या सूजन होने लगती है। इसके अलावा, जिम में ज़रूरत से ज़्यादा स्क्वैट्स करना, बिना सही स्ट्रेचिंग के एक्सरसाइज़ करना, या बार-बार एक ही तरह का ज़ोर घुटनों पर डालना भी नुकसानदेह हो सकता है। एक्टिव रहना ज़रूरी है, लेकिन ओवरडू करना घुटनों के लिए परेशानी खड़ी कर सकता है।
खान-पान और आदतों में क्या बदलाव ज़रूरी?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, खाने-पीने की वजह से सीधे घुटनों में दर्द होना बहुत कम मामलों में देखा जाता है। ज़्यादातर मामलों में दर्द की असली वजह गलत पोज़ीशन या ज़्यादा दबाव ही होती है। विटामिन D, कैल्शियम या विटामिन B12 की कमी को भी घुटनों के दर्द का बड़ा कारण नहीं माना जाता। हालांकि, कुछ खास स्थितियों में डाइट का असर पड़ सकता है। जैसे—अगर शरीर में यूरिक एसिड का स्तर बढ़ जाए। यूरिक एसिड ज़्यादा होने पर जोड़ों में सूजन आ सकती है, जिसमें घुटने भी शामिल हैं। ऐसे मामलों में डाइट में बदलाव ज़रूरी हो जाता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, शराब, बहुत ज़्यादा प्रोटीन और कुछ तरह के नॉन-वेज खाने से परहेज़ करना फायदेमंद हो सकता है।
इलाज क्या है?
रिपोर्ट्स बताती हैं कि इलाज शुरू करने से पहले यह जानना ज़रूरी होता है कि घुटनों या जोड़ों में दर्द की असली वजह क्या है। करीब 90% मामलों में दर्द का कारण गलत पोस्चर, मसल इम्बैलेंस या मांसपेशियों की कमजोरी होती है। ऐसे मामलों में फिजियोथेरेपी, सही एक्सरसाइज़ और पोस्चर सुधारने से ही आराम मिल जाता है। दवाइयों की ज़रूरत बहुत कम पड़ती है। कुछ मामलों में कोलेजन या जॉइंट-सपोर्ट सप्लीमेंट्स 1–2 महीने तक दिए जाते हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इतना करने से ज़्यादातर लोगों में जोड़ों और घुटनों का दर्द पूरी तरह ठीक हो जाता है।
डिस्क्लेमर:
यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी और उपलब्ध रिपोर्ट्स पर आधारित है। यह किसी भी प्रकार की मेडिकल सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है। किसी भी तरह की समस्या या दर्द की स्थिति में डॉक्टर या प्रमाणित फिजियोथेरेपिस्ट से सलाह लेना आवश्यक है।


