डॉ. रामजीलाल जांगिड़ अब हमारे बीच नहीं रहे। यह वाक्य लिखते हुए भीतर कहीं एक खालीपन उतर आता है। वो सिर्फ़ एक शिक्षक नहीं थे, बल्कि गुरु थे, ऐसे गुरु जिनके शब्द, जिनका भरोसा, जिनकी डांट और जिनका अपनापन, जीवन की दिशा तय कर देते हैं। मेरे लिए तो 1998 का वो दिन आज भी जस का तस है, जब आईआईएमसी के इंटरव्यू के दौरान उन्होंने मेरी ओर देखा और कहा—“तुम्हें यहां आना चाहिए।” यह सिर्फ़ एक प्रवेश की स्वीकृति नहीं थी, बल्कि एक जीवन का मार्ग खोल देने वाला वाक्य था। एक बैंकर को पत्रकार बनने की पहली औपचारिक सीढ़ी दे रहे थे। मैं नहीं जानता था कि यह रिश्ता आने वाले दशकों में मेरी सोच, मेरे पेशे और मेरे साहस का हिस्सा बन जाएगा।
कुछ ही हफ्ते पहले वरिष्ठ विकास मिश्रा की एक पोस्ट से पता चला कि सर अस्वस्थ हैं। मैं लंदन में था, लेकिन मन दिल्ली में अटक गया। पोस्ट पढ़ते ही सबसे पहले टिकट लिया और विकास जी को ही बताया कि गुरुजी को सूचना दे दें। फिर दिल्ली पहुंचते ही उन्हें फोन किया—“सर, दिल्ली आ गया हूं… कब आपके दर्शन करने आऊं?” उधर से वही पुरानी आत्मीय, ठहरी हुई आवाज़—“मैं तुम्हें जल्द से जल्द देखना चाहता हूँ।” थोड़ी देर में मैं उनके कमरे में था। वाकई पहली बार जांगिड़ सर बीमार दिखे लेकिन उनके चेहरे पर वही अपनापन, वही गंभीर मुस्कान। मैं घंटों बैठा रहा, तमाम किस्से चलते रहे। दुर्गानाथ स्वर्णकार और नितिन अग्रवाल पहले से मौजूद थे। बीच-बीच में कुछ और लोग आते-जाते रहे। हर बार वो एक ही बात कहते, बार-बार कहते — ये अनुरंजन झा है… इसको डर नहीं लगता।” उस वाक्य में उनका पुराना विश्वास, और शायद थोड़ा गर्व भी, साफ झलक रहा था।

जांगिड़ सर के बारे में बात करना केवल व्यक्तिगत भावुकता नहीं है, यह भारतीय पत्रकारिता के एक युग को याद करना भी है। उन्हें कई लोग आधुनिक पत्रकारिता का ‘द्रोणाचार्य’ कहते हैं। उनकी कुटिया में प्रवेश के लिए औपचारिक अड़चनें नहीं थीं,जिसे वो योग्य समझते, उसे अपने सान्निध्य में ले लेते। उनके शिष्य देश के लगभग हर बड़े मीडिया संस्थान में फैले हुए हैं। रवीश कुमार, सुप्रियो प्रसाद, सुधीर चौधरी, शालिनी जोशी, दीपक चौरसिया जैसे नाम उनके विद्यार्थियों की लंबी सूची के कुछ उदाहरण भर हैं। लेकिन उनकी नज़र में ये नाम बड़े या छोटे नहीं थे, हर छात्र उनके लिए उतना ही महत्वपूर्ण था।
वो सिर्फ़ क्लास में पढ़ाने तक सीमित नहीं रहते थे। अगर किसी छात्र की आर्थिक स्थिति कमजोर है तो उसकी फ़ीस माफ़ कराने के लिए पूरी ताकत लगा देते, किसी को रिपोर्टिंग का पहला मौका दिलाने के लिए संपादकों से सीधे सिफारिश कर देते, किसी को लिखने में कठिनाई हो तो आधा बोलकर लिखवा देते। उन्होंने अपने विद्यार्थियों के साथ अधिकार भी रखा और अपनापन भी। यही कारण था कि उनका क्लासरूम महज एक शैक्षिक जगह नहीं, बल्कि एक नैतिक प्रशिक्षण की जगह भी था।
1980 के दशक उन्होंने IIMC में हिंदी पत्रकारिता के कोर्स डायरेक्टर के रूप में नया पाठ्यक्रम शुरू किया था। इससे पहले वे अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता के कोर्स पढ़ाते थे, लेकिन हिंदी माध्यम के छात्रों के लिए उन्होंने जो दिशा तय की, उसने आने वाले वर्षों में हिंदी पत्रकारिता को नई ऊंचाई दी। उनकी क्लास में पढ़ना किसी महाभारत के संजय को सुनने जैसा था। वो खबर नहीं सुनाते थे, पूरी स्थिति जीने देते थे।
विकास मिश्रा ने उनके साथ बिताए पलों को याद करते हुए कहा था कि उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी अपनापन और अधिकार भाव का अद्भुत संतुलन। वो छात्रों से कह सकते थे—“जाकर कैंटीन से मेरे लिए दही लाओ”—और वही छात्र बाद में देश के नामी पत्रकार बनते। उनके लिए यह कोई फर्क नहीं रखता था कि कौन कहां पहुंचा है, वो अपने विद्यार्थियों को हमेशा उसी ठसक और हक़ से बुलाते, डांटते और आदेश देते थे।

मेरे लिए यह रिश्ता आखिरी मुलाक़ात तक वैसा ही बना रहा। उनके जाने की खबर आई तो लगा जैसे कोई सुरक्षा-कवच हट गया हो। गुरु केवल ज्ञान नहीं देते, वे जीवन जीने का साहस भी देते हैं। जांगिड़ सर मेरे लिए वही थे—साहस का स्रोत, भरोसे की छाया और यह याद दिलाने वाली आवाज़ कि डर के आगे ही असली दुनिया है। कैंपस की दोपहरें, पुराने अख़बार के पन्नों पर प्रैक्टिस, मास कम्युनिकेशन की थ्योरी के बीच अचानक जीवन के बड़े सवाल—ये सब अब स्मृतियों में दर्ज हैं।
आज जब उनके जाने की बात लिख रहा हूं, तो लगता है कि उनके जैसे गुरु अब दुर्लभ हैं। उनका जीवन, उनका काम और उनका असर न सिर्फ़ उनके छात्रों के भीतर, बल्कि भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में भी दर्ज है। वो चले गए, लेकिन उनकी दी हुई सीख—“डर मत, सच कहने से मत हिचको”—हमेशा साथ रहेगी।
विनम्र श्रद्धांजलि।